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नज़्म
अलीगढ़ है यहाँ ऐ दोस्त क्या पाया नहीं जाता
यहाँ वो कौन सा शो है जो दिखलाया नहीं जाता
सय्यदा फ़रहत
नज़्म
उजले लफ़्ज़ों के शो-केसों में सजा कर हम-कलामी करते थे
जाने कितने जिस्मों के विसाल से होते हुए
अंजुम सलीमी
नज़्म
ग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैं
शोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
बस्ती के सजीले शोख़ जवाँ बन बन के सिपाही जाने लगे
जिस राह से कम ही लौट सके उस राह पे राही जाने लगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ये भी हैं ऐसे कई और भी मज़मूँ होंगे
लेकिन उस शोख़ के आहिस्ता से खुलते हुए होंट