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नज़्म
अब इस में सीलन क्यूँ आ गई है....?
हमारा बिस्तर कि जिस में कोई शिकन नहीं है, उसी पे कब से,
फ़रीहा नक़वी
नज़्म
ज़र्द सीलन के ख़ोल में रख़्ने बुनता
शहर-ए-मा'दूम का लाशा नोचते ख़ुदा को घूरता हुआ मैं
हसन अल्वी
नज़्म
सिनान ओ गुर्ज़ ओ शमशीर ओ तबर ख़ंजर नहीं लाज़िम
बस इक एहसास लाज़िम है कि हम बुअदैन हैं दोनों
जौन एलिया
नज़्म
मेरी उम्मीदों का हासिल मिरी काविश का सिला
एक बे-नाम अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं