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नज़्म
कहीं कहीं इस काली सिल पर कोई सफ़ेद गुलाब
यूँ बे-ताब पड़ा था जैसे अंधी आँख का ख़्वाब
अहमद फ़राज़
नज़्म
जो सिल पर सुर्ख़ मिर्चें पीस कर सालन पकाती थीं
सहर से शाम तक मसरूफ़ लेकिन मुस्कुराती थीं
असना बद्र
नज़्म
बर्फ़ की सिल ने मिरे दिल की जगह पा ली है
अब धुँदलके भी नहीं ज़ीनत-ए-चश्म-ए-बे-ख़्वाब
अमजद इस्लाम अमजद
नज़्म
और हमारा चाँद अभी तक ऐसी कोहना-साल हवेली का क़ैदी है
जिसे हवा और बादल ने तामीर किया है