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नज़्म
दिल ही तेरा पाक नहीं तो क्या सिमरन क्या ध्यान
ज़मज़म में तू ग़ुस्ल करे या गंगा में अश्नान
अमजद नजमी
नज़्म
सिनान ओ गुर्ज़ ओ शमशीर ओ तबर ख़ंजर नहीं लाज़िम
बस इक एहसास लाज़िम है कि हम बुअदैन हैं दोनों
जौन एलिया
नज़्म
मसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा कर
शबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
कभी तुम ख़ला से गुज़रो किसी सीम-तन की ख़ातिर
कभी तुम को दिल में रख कर कोई गुल-अज़ार आए
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तुझ को वो रुख़ अपनी सीरत का दिए देते हैं हम
जिस में यज़्दानी निसाइयत की ज़ुल्फ़ों के हैं ख़म
जोश मलीहाबादी
नज़्म
पुराने साल की ठिठुरी हुई परछाइयाँ सिमटीं
नए दिन का नया सूरज उफ़ुक़ पर उठता आता है