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नज़्म
मगर हूँ दिल से मैं इस के लिए सिपास-गुज़ार
लरज़ते हाथों से दामन ख़ुलूस का न छटा
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
इक़बाल सुहैल
नज़्म
इक तरफ़ चलते हैं हल इक सम्त चलते हैं ख़र्रास
इतनी मेहनत और लब पर नग़मा-ए-शुक्र-ओ-सिपास
अर्श मलसियानी
नज़्म
हर मंज़िल में अब साथ तिरे ये जितना डेरा-डांडा है
ज़र दाम-दिरम का भांडा है बंदूक़ सिपर और खांडा है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्या
आरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्या
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हर जानिब बे-नूर खड़ी है हिज्र की शहर-पनाह
थक कर हर सू बैठ रही है शौक़ की मांद सिपाह
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सिपाह-ए-महर का फ़सील-ए-शब को इंतिज़ार है
कब आएगा वो शख़्स जिस का सब को इंतिज़ार है