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नज़्म
उसे इक खोटे सिक्के की तरह सब को दिखाना है
कभी जब सोचता हूँ अपने बारे में तो कहता हूँ
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
इस गिरानी में भला क्या ग़ुंचा-ए-ईमाँ खिले
जौ के दाने सख़्त हैं ताँबे के सिक्के पिल-पिले
जोश मलीहाबादी
नज़्म
तेज़ी-ए-रफ़्तार के सिक्के जमाती जा-ब-जा
दश्त ओ दर में ज़िंदगी की लहर दौड़ाती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
हमें ज़ोफ़-ए-बसारत से कहाँ थी ताब-ए-नज़्ज़ारा
सिखाए उस के पर्दे ने हमें आदाब-ए-नज़ारा