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नज़्म
किसी ने हाल पूछा तो बहुत ही बे-नियाज़ी से
कहा जी हाँ ख़ुदा का शुक्र है मैं ख़ैरियत से हूँ
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
दौलत की आँखों का सुर्मा बनता है हमारी हड्डी से
मंदिर के दिए भी जलते हैं मज़दूर की पिघली चर्बी से
जमील मज़हरी
नज़्म
तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़
न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़