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नज़्म
इक बुझी रूह लुटे जिस्म के ढाँचे में लिए
सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूँ
साहिर लुधियानवी
नज़्म
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जब रात का बढ़ता है सन्नाटा चैन से दुनिया सोती है
तब आँख मिरी खुल जाती है और दिल की रग रग रोती है
बहज़ाद लखनवी
नज़्म
अभी तो सोती हैं हवाओं की वो संसनाहटें
कि जिस को सुनते ही हुकूमतों के रंग-ए-रुख़ उड़ें