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नज़्म
कैसे सोऊँ मैं निशाँ तक भी न हो जब रात का
मेरी अम्माँ अब तो रातें सारी ग़ाएब हो गईं
हामिदुल्लाह अफ़सर
नज़्म
सुख़न माल-ए-मोहब्बत की दुकान-आराई करता है
सुख़न सौ तरह से इक रम्ज़ की रुस्वाई करता है
जौन एलिया
नज़्म
रंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौत
मोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूद