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नज़्म
कट मरा नादाँ ख़याली देवताओं के लिए
सुक्र की लज़्ज़त में तू लुटवा गया नक़्द-ए-हयात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तेरा जोबन कि जो शर्मिंदा-ए-सद-फ़ित्ना है
सुक्र ये तेरे हुज़ूरी का बयाँ कैसे हो
अख़लाक़ अहमद आहन
नज़्म
शुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू ने
हम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
उँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़
इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़
कफ़ील आज़र अमरोहवी
नज़्म
घर-बार अटारी चौपारी क्या ख़ासा नैन-सुख और मलमल
चलवन पर्दे फ़र्श नए क्या लाल पलंग और रंग-महल
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तू चाहे तो मैं फिर पलट जाऊँ उन अपने महजूर कूज़ों की जानिब
गिल-ओ-ला के सूखे तग़ारों की जानिब
नून मीम राशिद
नज़्म
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नग़्मे गाएगी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ख़ुदा का शुक्र है कि तुम उन से मुख़्तलिफ़ निकले
जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं
तहज़ीब हाफ़ी
नज़्म
ख़ुदारा शुक्र की तल्क़ीन अपने पास ही रक्खें
ये लगती है मिरे सीने पे बन कर तीर मौलाना