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नज़्म
चाँद के हाथ दुआ के हर्फ़ ही भूल गए
हवा के लब बर्फ़ीले सुमों में नीले पड़ कर अपनी सदाएँ खो बैठे
परवीन शाकिर
नज़्म
घोड़ों के सुमों से मेख़ होती आरज़ू अपनी गवाही किस तरह देगी
मुअय्यन हौसले संदूक़चों में जाँ-ब-लब हैं
फर्रुख यार
नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तुम्हारे शेर पढ़ कर जाने क्यूँ महसूस होता है
कि कोई साज़ पर मद्धम सुरों में गुनगुनाता है
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
धनक गीत बन के समाअ'त को छूने लगी हो
शफ़क़ नर्म कोमल सुरों में कोई प्यार की बात कहने चली हो
परवीन शाकिर
नज़्म
दिलों पे ख़ौफ़ के पहरे लबों पे क़ुफ़्ल सुकूत
सुरों पे गर्म सलाख़ों के शामियाने हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
साथ इक दोस्त के इक दिन जो मैं गुलशन में गया
वाँ के सर्व-ओ-सुमन-ओ-लाला-ओ-गुल को देखा