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नज़्म
कि आलम इक बहार-ए-सुर्ख़ी-ए-ख़ून-ए-शहीदाँ है
ये महर-ओ-माह ओ परवीं ये ज़मीं ये लाला-ओ-नस्रीं
उबैदुर्रहमान आज़मी
नज़्म
दिल-ए-बेताब में पिन्हाँ है हर अरमान-ए-नज़र
चश्म-ए-मुश्ताक़ में है सुर्ख़ी-ए-अफ़्साना-ए-दिल
जगन्नाथ आज़ाद
नज़्म
न सुर्ख़ी-ए-लब-ए-खंजर न रंग-ए-नोक-ए-सिनाँ
न ख़ाक पर कोई धब्बा न बाम पर कोई दाग़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
इशरतें ख़्वाबीदा रंग-ए-ग़ाज़ा-ए-रुख़सार में
सुर्ख़ होंटों पर तबस्सुम की ज़ियाएँ जिस तरह
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
दिन में ये मल्गजे कपड़ों में नज़र आती है
रात में करती है आराइश-ए-ज़ुल्फ़-ओ-रुख़सार
सलाम संदेलवी
नज़्म
क्यों निगाहों में है अफ़्सुर्दा चराग़ों का धुआँ
आरज़ू-ए-लब-ओ-रुख़्सार में ये तो होगा
अहमद फ़राज़
नज़्म
न ज़िक्र-ए-सुर्ख़ी-ए-लब और न तेरी चश्म की बात
तिरी जबीं का उजाला न तेरी ज़ुल्फ़ की रात
रियाज़ अनवर
नज़्म
इश्क़ नज़्ज़ारा-ओ-दीदार से आगे की है बात
इश्क़ चश्म-ओ-लब-ओ-रुख़सार से आगे की है बात
अनवार अब्बास
नज़्म
देस परदेस के यारान-ए-क़दह-ख़्वार के नाम
हुस्न-ए-आफ़ाक़, जमाल-ए-लब-ओ-रुख़्सार के नाम