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नज़्म
अहल-ए-दिल जो आज गोशा-गीर-ओ-सुर्मा-दर-गुलू
अब तना ता-हू भी ग़ाएब और या-रब हा भी गुम
नून मीम राशिद
नज़्म
दौलत की आँखों का सुर्मा बनता है हमारी हड्डी से
मंदिर के दिए भी जलते हैं मज़दूर की पिघली चर्बी से
जमील मज़हरी
नज़्म
कुछ अंधे सूरमा जो तीर अँधेरे में चलाते हैं
सदा दुश्मन का सीना ताकते ख़ुद ज़ख़्म खाते हैं
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
आज भी अश्क-ए-ख़ूँ मिरा क़श्क़ा जबीन-ए-नाज़ का
आज भी ख़ाक-ए-दिल मिरी सुरमा-ए-चश्म-ए-गुल-रुख़ाँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
जिस की ख़ातिर पी गए जाम-ए-शहादत सूरमा
राजपूतों का वो का'बा देखने आया हूँ मैं
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
मिरी निगाहों में इज़्ज़त है सारी दुनिया की
मगर है ख़ाक-ए-वतन सुर्मा चश्म-ए-बीना की