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नज़्म
नूर के तड़के जगाना मुँह धुलाना प्यार से
देख कर मुखड़े को कहना आफ़रीं सद आफ़रीं
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
हक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी हो
लहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरें
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जो ताक़-ए-हरम में रौशन है वो शम्अ यहाँ भी जलती है
इस दश्त के गोशे गोशे से इक जू-ए-हयात उबलती है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अहद-ए-वफ़ा या तर्क-ए-मोहब्बत जो चाहो सो आप करो
अपने बस की बात ही क्या है हम से क्या मनवाओगे