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नज़्म
साज़ बजते हैं मोहब्बत के दरून-ए-महफ़िल
तू दर-ए-यार के दरबाँ की शक़ावत को न देख
सफ़दर आह सीतापुरी
नज़्म
बे-शक ज़मीं में मुझ को ख़ुश हो के अब मिला तू
दर्द-ए-ज़बाँ हूँ सब का अफ़्साना हो गया हूँ
रामपत यादव
नज़्म
मोहब्बत करने वालों की मोहब्बत से बहुत कम था
दम-ए-रुख़्सत हम उन के आगे जितना रो के आए हैं
नवाब सय्यद हकीम अहमद नक़्बी बदायूनी
नज़्म
सरसर-ए-बे-ए'तिदाली से गुरेज़ाँ फ़िक्र-ओ-फ़न
होश में था ता-दम-ए-आख़िर ज़मीर-ए-मो'तबर