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नज़्म
कि इस फ़ज़ा में फ़राज़-ए-सहरा-ए-बे-अमाँ हैं
हज़ारों मासूम एड़ियाँ रगड़ चुके हैं रगड़ रहे हैं
अम्बर बहराईची
नज़्म
ज़र्द परचम उड़ाता हुआ लश्कर-ए-बे-अमाँ गुल-ज़मीनों को पामाल करता रहा
और हवा चुप रही
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
बला-ए-बे-अमाँ है तौर ही इस के निराले हैं
कि इस ने ग़ैज़ में उजड़े हुए घर फूँक डाले हैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
एक हिज्र-ए-बे-अमाँ है एक कोह-ए-आतिशीं
सोज़-ए-जाँ है क्या शुऊ'र-ए-ज़ीस्त क्या ना-आगही
सिद्दीक़ कलीम
नज़्म
जहाँ इक साँस भी लेने से घबराते थे हंगामे
जलाल-ए-बे-अमाँ से डर के सो जाते थे हंगामे