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नज़्म
वा'इज़ से परेशान था मुल्लाओं से बेज़ार
मज़हब से शनासा था मगर हक़ का तरफ़-दार
फ़ातिमा वसीया जायसी
नज़्म
गले घुटते हैं या फिर टूटती हैं फाँसियाँ देखें
सर-ओ-दोश इक तरफ़ दार-ओ-रसन की आज़माइश है
फ़ज़लुर्रहमान
नज़्म
'मीर' जी के भी तरफ़-दार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
मादर-ए-हिन्द के फ़नकार थे मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
मैं इस शहर-ए-ख़राबी में फ़क़ीरों की तरह दर दर फिरा बरसों
उसे गलियों में सड़कों पर