aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "tarfa-e-sohbat"
बाइ'स-ए-दर्द हुई क़ुर्बत-ए-याराँ अक्सरअब मुझे आरज़ू-ए-सोहबत-ए-जानाँ भी नहीं
यूँ विसाल-ए-सुब्ह का अरमाँ फ़िराक़-ए-सोहबत-ए-शब बन गयाख़ुद फ़रेबी और ख़ुश-फ़हमी के सारे रास्ते मसदूद हो कर रह गए
नसीब-ए-सोहबत-ए-याराँ नहीं तो क्या कीजेये रक़्स-ए-साया-ए-सर्व-ओ-चिनार का मौसम
जान-ए-'सहबा' सच कहो पैहम सहारे याद हैंवो निगाह-ए-अव्वलीं के क्या शरारे याद हैं
जब ये मौसम आएसेहत ख़ूब बनाए
हवा जाम-ए-सेहत तज्वीज़ करती है
'सहबा'-असर निगाह है हर जुम्बिश-ए-निगाहनज़रों से जाम-ए-मस्त पिलाती चली गईं
हस्ती के ज़मज़मों में साज़-ए-क़रार बन करसहबा-ए-आतिशीं का रंगीं ख़ुमार बन कर
महफ़िल भी वही मुतरिब भी वही सहबा भी वही साग़र भी वहीमय-नोश जो पीने आए थे सहबा-ए-मोहब्बत भूल गए
'सहबा' असर निगाह की अल्लाह रे कश्मकशनींदों में कैफ़-ओ-कम की शुरूआ'त हो गई
तेरा पागल-पनतेरी वज्ह-ए-शोहरत है
हलवे खाने के दिन आएसेहत बनाने आए धूप
फिर हमारी तरफ़ आ गईऔर फिर यूँ हुआ
गाह किसी साए की तरफ़ मसरूफ़-ए-ख़िरामऔर कभी वहशत में झूमते देखा है
है यही वज्ह-ए-इंक़लाबमुज़्दा-दह-ए-सबात भी
छेड़ दे मुतरिब कोई तरानाआ जाए इशरत का ज़माना
ऐ साहिब-ए-नाम-ओ-शोहरतजिस को कल
या मैंजदीद हिफ़्ज़ान-ए-सेहहत के उसूलों के मुताबिक़
रुत सजाए लहू में नहाएज़मीं की तरफ़ आ रहे हैं
तर्फ़-ए-गुल खिले थे जबज़ख़्म ही सिले थे जब
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