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नज़्म
नील-गगन के सागर में ये चाँद की कश्ती डोल रही है
जैसे एक सुनहरी तितली उड़ने को पर तौल रही है
अहमद वसी
नज़्म
उसूल-ए-मेहर-ओ-उल्फ़त से न वो ग़ाफ़िल न मैं ग़ाफ़िल
दबिस्तान-ए-मोहब्बत में न वो जाहिल न मैं जाहिल
अली मंज़ूर हैदराबादी
नज़्म
तब' कहती थी ज़माने भर की आँखें खोल दूँ
ज़र्रा-ओ-ख़ुर्शीद मीज़ान-ए-सुख़न में तौल दूँ
बर्क़ आशियान्वी
नज़्म
क्या बात हुई किस तौर हुई अख़बार से लोगों ने जाना
इस बस्ती के इक कूचे में इक इंशा नाम का दीवाना
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
सुकूत-आमोज़ तूल-ए-दास्तान-ए-दर्द है वर्ना
ज़बाँ भी है हमारे मुँह में और ताब-ए-सुख़न भी है