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नज़्म
मुझे दश्त-ए-तख़य्युल का सफ़र करना अगर आता
तवाफ़-ए-काबा करता, ज़िंदगी को सम्त मिल जाती
कौसर मज़हरी
नज़्म
सौदा है लीडरी का जो दिल को सताए है
''दिल फिर तवाफ़-ए-कू-ए-मलामत को जाए है''
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
अब्दुल अहद साज़
नज़्म
तवाफ़-ए-राएगाँ की आदतें भी अब पुरानी हैं
यक़ीं-आसार घड़ियाँ भी तसर्रुफ़ में नहीं मेरे
हिजाब अब्बासी
नज़्म
अज़ल से तवाफ़-ए-मुकर्रर में मसरूफ़ हो
वो तुम्हारे ही अंदर की सिमटी हुई तारीकियों के सिवा कुछ नहीं है
यूसुफ़ तक़ी
नज़्म
यही वादी है वो हमदम जहाँ 'रेहाना' रहती थी
ब-रब्ब-ए-काबा उस की याद में उम्रें गँवा दूँगा
अख़्तर शीरानी
नज़्म
ख़ाली हैं गरचे मसनद ओ मिम्बर, निगूँ है ख़ल्क़
रोअब-ए-क़बा ओ हैबत-ए-दस्तार देखना