aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "thath"
टुक हिर्स-ओ-हवा को छोड़ मियाँ मत देस बिदेस फिरे माराक़ज़्ज़ाक़ अजल का लूटे है दिन रात बजा कर नक़्क़ाराक्या बधिया भैंसा बैल शुतुर क्या गौनें पल्ला सर-भाराक्या गेहूँ चाँवल मोठ मटर क्या आग धुआँ और अँगारासब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
सामान जहाँ तक होता है उस इशरत के मतलूबों कावो सब सामान मुहय्या हो और बाग़ खिला हो ख़्वाबों काहर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों काइस ऐश मज़े के आलम में एक ग़ोल खड़ा महबूबों का
नक़्श याँ जिस के मियाँ हाथ लगा पैसे काउस ने तय्यार हर इक ठाठ किया पैसे काघर भी पाकीज़ा इमारत से बना पैसे काखाना आराम से खाने को मिला पैसे काकपड़ा तन का भी मिला ज़ेब-फ़ज़ा पैसे काजब हुआ पैसे का ऐ दोस्तो आ कर संजोगइशरतें पास हुईं दूर हुए मन के रोगखाए जब माल-पूए दूध दही मोहन-भोगदिल को आनंद हुए भाग गए रोग और धोगऐसी ख़ूबी है जहाँ आना हुआ पैसे कासाथ इक दोस्त के इक दिन जो मैं गुलशन में गयावाँ के सर्व-ओ-सुमन-ओ-लाला-ओ-गुल को देखापूछा उस से कि ये है बाग़ बताओ किस काउस ने तब गुल की तरह हँस दिया और मुझ से कहामेहरबाँ मुझ से ये तुम पूछा हो क्या पैसे काये तो क्या और जो हैं इस से बड़े बाग़-ओ-चमनहैं खिले कियारियों में नर्गिस-ओ-नसरीन-ओ-समनहौज़ फ़व्वारे हैं बंगलों में भी पर्दे चलवनजा-ब-जा क़ुमरी-ओ-बुलबुल की सदा शोर-अफ़्गनवाँ भी देखा तो फ़क़त गुल है खिला पैसे कावाँ कोई आया लिए एक मुरस्सा पिंजङ़ालाल दस्तार-ओ-दुपट्टा भी हरा जूँ-तोताइस में इक बैठी वो मैना कि हो बुलबुल भी फ़िदामैं ने पूछा ये तुम्हारा है रहा वो चुपकानिकली मिन्क़ार से मैना के सदा पैसे कावाँ से निकला तो मकाँ इक नज़र आया ऐसादर-ओ-दीवार से चमके था पड़ा आब-ए-तलासीम चूने की जगह उस की था ईंटों में लगावाह-वा कर के कहा मैं ने ये होगा किस काअक़्ल ने जब मुझे चुपके से कहा पैसे कारूठा आशिक़ से जो माशूक़ कोई हट का भराऔर वो मिन्नत से किसी तौर नहीं है मनताख़ूबियाँ पैसे की ऐ यारो कहूँ मैं क्या क्यादिल अगर संग से भी उस का ज़ियादा था कड़ामोम-सा हो गया जब नाम सुना पैसे काजिस घड़ी होती है ऐ दोस्तो पैसे की नुमूदहर तरह होती है ख़ुश-वक़्ती-ओ-ख़ूबी बहबूदख़ुश-दिली ताज़गी और ख़ुर्मी करती है दुरूदजो ख़ुशी चाहिए होती है वहीं आ मौजूददेखा यारो तो ये है ऐश-ओ-मज़ा पैसे कापैसे वाले ने अगर बैठ के लोगों में कहाजैसा चाहूँ तो मकाँ वैसा ही डालूँ बनवाहर्फ़-ए-तकरार किसी की जो ज़बाँ पर आयाउस ने बनवा के दिया जल्दी से वैसा ही दिखाउस का ये काम है ऐ दोस्तो या पैसे कानाच और राग की भी ख़ूब-सी तय्यारी हैहुस्न है नाज़ है ख़ूबी है तरह-दारी हैरब्त है प्यार है और दोस्ती है यारी हैग़ौर से देखा तो सब ऐश की बिस्यारी हैरूप जिस वक़्त हुआ जल्वा-नुमा पैसे कादाम में दाम के यारो जो मिरा दिल है असीरइस लिए होती है ये मेरी ज़बाँ से तक़रीरजी में ख़ुश रहता है और दिल भी बहुत ऐश-पज़ीरजिस क़दर हो सका मैं ने किया तहरीर 'नज़ीर'वस्फ़ आगे मैं लिखूँ ता-ब-कुजा पैसे का
कामनी ख़्वाब की लौ में हँसती हुई कामनीसोला बरस की तक़्वीम में फ़स्ल-ए-गुल का कोई तज़्किरातक न थामैं ने बत्तीस बत्तीस झड़ रुतें काट दींअब जो तमसील के एक वक़्फ़े में तुम से मिला हूँतो साँसों में नम चाल में उन ज़मानों का रमजी उठा हैजो अहद-ए-ज़मिस्ताँ में यख़ थेसक़र सा सक़रकामनी ख़ंदा-ए-गुल की कुल ज़िंदगीएक गुलचीं की वहशत भरी आँख हैये चटकना ये खुलनाबहुत सेहर-आवर सही जागने और सोने में इकख़्वाब-ए-मौहूम से कुछ ज़ियादा नहींख़्वाब-ओ-ख़्वाहिश अजब सिलसिला हैबहुत दूर बहती हुई आबशारों का इक सिलसिलाजिस में कोह-ए-तज़ब्ज़ुब की ख़ुशबू भी हैअहद-ओ-पैमाँ का जादू भीख़ूँ से सुरों तकसुरों से उस इक लफ़्ज़ तकजिस में रागों का जौहर बँधा हैकहीं एेमनी रस कहीं मारवा ठाठ भाग्यश्रीभैरवीं और पहाड़ीवो सब कुछ जो अपने लहू में दहकता चहकता हैजिस के तनाज़ुर में हम बीस्त-ओ-शश-सालपहले बंधे थेउन्ही आबशारों से मुझ को सदा आ रही हैसो मैं जा रहा हूँनए सुर उठानेकि सरगम की फ़रसूदगी दीदा-ओ-दिल बुझाने लगी हैनया सुर जिसे लफ़्ज़ तरतीब देते हैंपहुँचे तो जानो कि सानेअ' के लफ़्ज़ों से उठती नमी तुमतक आई
ये रूप दिखा कर होली के जब मैन रसीले टुक मटकेमँगवाए थाल गुलालों के भर डाले रंगों से मटकेफिर साँग बहुत तय्यार हुए और ठाठ ख़ुशी के झुर मटकेग़ुल शोर हुए ख़ुश-हाली के और नाचने गाने के खटकेमिर्दंगें बाजें ताल बजे कुछ खनक खनक कुछ धनक धनक
जमीला शकीला की थी इक सहेलीसहेली भी इक उम्र की साथ खेलीबहुत ही था इख़्लास और प्यार उन मेंहुई थी न झूटों भी तकरार उन मेंथी यूँ तो हर इक खेल से उन को रग़बतमगर सब से बढ़ कर थी गुड़ियों की चाहतजमीला की गुड़िया थी चीनी की मूरतशकीला का गुड्डा भी था ख़ूबसूरतशकीला ने सोचा कि शादी रचाएँजमीला सहेली को समधन बनाएँशकीला बड़े चाव से चल के आईवो गुड्डे की मंगनी का पैग़ाम लाईकई लड़कियाँ और भी साथ आईंजमीला के घर आ के बातें बनाईंइधर की उधर की हुईं ख़ूब बातेंये मंगनी की बातें रहीं चंद रातेंये बात और वो बात और कभी हाँ कभी नाँकई दिन रहीं बी शकीला परेशाँपर आख़िर वो आ ही गई नेक साअ'तन बाक़ी रही कोई झगड़े की सूरतजमीला ने मंज़ूर कर ली ये शादीख़बर सारे बच्चों को इस की सुना दीइजाज़त उन्हों ने बड़ों से भी ले लीफिर अच्छी सी तारीख़ शादी की तय कीक़रीब आए शादी की तक़रीब के दिनतो काटे ये दिन सारे बच्चों ने गिन गिनवो शादी की तारीख़ जिस रोज़ आईमसर्रत ने दुनिया में नौबत बजाईशकीला ने गुड्डे को दूल्हा बनायाउसे एक बढ़िया सा जोड़ा पहनायावो कुर्ता वो अचकन वो पगड़ी वो पटकावो रेशम की शलवार वस्ली का जूतावो मुन्ना सा रूमाल मोज़े टसर केझमकती कला उस के सलमे सितारेजड़ाव अँगूठी वो मोती की मालावो रंगीन जामा वो फूलों का सहराबिठा उस को घोड़े पे वो साथ लाईबरात उस ने गुड्डे की अपनी सजाईचले साथ बन बन के बच्चे बरातीचली पार्टी एक गाती बजातीतड़ातड़ वो ताशों की बाजों की टें-टेंमजीरे की टन टन नफ़ीरी की पें-पेंवो लोगों का चलना पटाख़ों का छुटनाहवा में अनारों के फूलों का लुटनाइसी ठाठ से चल के बारात आईदुल्हन की तरफ़ से हुई पेशवाईजमीला ने सब का क्या ख़ैर मुक़द्दममिले हो के बाहम वो सब शाद-ओ-ख़ुर्रमजहाँ फ़र्श इक चाँदनी का बिछा थाथी मसनद नई गाव तकिया नया थावहाँ मेहमानों को लॉकर बिठायादिए पान और सब को शर्बत पिलायाबुलाए गए शहर से एक क़ाज़ीदुल्हन और दूल्हा हुए दोनों राज़ीज़रा देर में हो गई उन की शादीसभी अहल-ए-महफ़िल ने दिल से दुआ दीछुवारे लुटे फिर बटी कुछ मिठाईमिठाई ये सब ने मज़े ले के खाईहुए शाद मेहमान छोटे बड़े कुलमुबारक सलामत का पस मच गया ग़ुलहुआ वक़्त गुड़िया की रुख़्सत का जिस दमजमीला के चेहरे पे था ग़म का आलमशकीला ने झट पालकी इक मँगाईबिठा उस में गुड़िया को घर अपने लाईहुई ख़ूब शोहरत हुआ ख़ूब ख़र्चारहा शहर में मुद्दतों इस का चर्चाग़रज़ ब्याह गुड्डे का गुड़िया का जैसाहुआ ये हुआ होगा 'नय्यर' न ऐसा
टूट बटूट का इक तोता हैउम्र है उस की हफ़्ते आठमियाँ मिठ्ठू नाम है उस कासब कहते हैं मियाँ माठवाह मियाँ मिठ्ठू तेरे ठाठ
दो एका दोहो हो होदो दूनी चारआओ खेलें यारदो तिया छेहै है हैदो चौके आठकर लो भय्या ठाठदो पंजे दसकह दो बसदो छक्के बारहचाँद सितारादो सत चौदहरह सीधा सादादो अठे सोलातू नहीं भोलादो नवाँ अठारहखुल गया चेहरादो दहाई बीसन हुए टीस
सिक्का अपना राज भी अपनातख़्त भी अपना ताज भी अपनापैलेस अपना लॉज भी अपनाकल भी अपना आज भी अपनाहम फिर अपना ठाठ जमाएँमुल्क के फिर अच्छे दिन आएँ
परचम सर-ए-मैदान-ए-विग़ा खोल रहा हैमंसूर के पर्दे में ख़ुदा बोल रहा हैक्या सैल-ए-बग़ावत है मुरीदों की सफ़ों मेंपीरान-ए-तही-दस्त का दिल डोल रहा हैऐ वाए सबा अक़रब-ए-जर्रारा चमन मेंसरसर के इशारात पे बिस घोल रहा हैअफ़रंग के देरीना ग़ुलामों की रज़ा परख़ुद पीर-ए-हरम बंद-ए-क़बा खोल रहा हैकुछ बात ही ऐसी है कि पैमाना-ए-ज़र मेंइक रिंद-ए-तुनुक-ज़र्फ़ लहू तोल रहा हैबुज़-ग़ाला-ए-अफ़रंग शगालों के जिलौ मेंकिस ठाठ से ज़रग़ाम-सिफ़त बोल रहा हैतारीख़ के वीराना-ए-आबाद में 'शोरिश'कुछ क़ीमती मोती हैं क़लम रोल रहा है
इक दिन बी मुर्ग़ी से छुप कर निकले सैर को चूज़े दसकुचल के भागी इक चूज़े को शहर की नीली ओमनी बसबाक़ी रह गए नौचूँ चूँ करते शोर मचाते आगे बढ़े ये चूज़े नौठहर गया इक चूज़ा देख के कूड़े के इक ढेर में जोबाक़ी रह गए आठचूँ चूँ करते शोर मचाते आगे बढ़े अब चूज़े आठदेखने जोहड़ पर एक ठहरा बत्तख़ के बच्चों के ठाठबाक़ी रह गए सातचूँ चूँ करते शोर मचाते आगे बढ़े लो चूज़े सातइक ने गधे से हाथ मिला कर खाई यारो ऐसी लातबाक़ी रह गए छेचूँ चूँ करते शोर मचाते आगे बढ़े जब चूज़े छेसब से बड़े ने रुक कर पूछा हम कल कितने भाई थेगिने तो निकले पाँचचूँ चूँ करते शोर मचाते आगे बढ़े अब चूज़े पाँचपैर पकड़ कर बैठ गया इक ऐसा चुभा पंजे में काँचबाक़ी रह गए चारचूँ चूँ करते शोर मचाते आगे बढ़े ये चूज़े चारइक को रोक लिया बिल्ली ने ऐसा उस पर आया प्यारबाक़ी रह गए तीनचूँ चूँ करते शोर मचाते आगे बढ़े अब चूज़े तीनठहर गया इक चूज़ा सुन कर इक जोगी की मीठी बीनबाक़ी रह गए दोचूँ चूँ करते शोर मचाते आगे बढ़े जब चूज़े दोउड़ती चील अचानक झपटी ले गई सब से छोटे कोबाक़ी रह गया एकएक अकेला चूँ चूँ बोला घर को भागा बन कर नेकएक ख़ुदा है एक रसूल है अपना दीन ईमान भी एक
मज़दूर का क़िस्सा क्या इतना ही फ़साना हैलफ़्ज़ों में फ़क़त इस का हमदर्द ज़माना हैदौलत के नुमाइंदे ख़ुद-साख़्ता लीडर हैंहिन्दू को मुसलमाँ से काम इन का लड़ाना हैबहरूप बदलते हैं हर रोज़ निराले वोहर हाल में इन को बस ख़ैर अपनी मनाना हैइन से कोई पूछे तो लीडर हैं कि डिक्टेटरमंज़िल है कहाँ इन की किस राह से जाना हैहै दौलत-ओ-सर्वत का कुछ नश्शा जिसे सुन लेसर आज ग़रीबों को नख़वत का झुकाना हैहुशियार ग़रीबों के बदले हुए तेवर हैंमाने कि न माने तू इक बार जताना हैफ़ौलाद के पंजे से मुमकिन है रिहाई क्याक्या नाम-ओ-निशाँ अपना ख़ुद तुझ को मिटाना हैये ठाठ तिरे ग़ाफ़िल सब जिस की बदौलत हैंकुछ इस के लिए तुझ को तकलीफ़ उठाना हैमज़दूर की अज़्मत से इंकार न कर ग़ाफ़िलमज़दूर की ठोकर में दुनिया का ख़ज़ाना हैहम ये भी समझते हैं और ख़ूब समझते हैंदुख-दर्द मिटाने को तकलीफ़ उठाना है'नज़मी' ये 'जिगर' का भी क्या ख़ूब ही मिसरा हैहम ख़ाक-नशीनों की ठोकर में ज़माना है
एक एकन एकमामूँ लाया केकदो एकन दोअम्मी बोली लोतीन एकन तीनचचा गया चीनचार एकन चारचची लाई कारपाँच एकन पाँचख़ालू बोले साँचछे एकन छेख़ाला अच्छी हैसात एकन सातभय्या की बारातआठ एकन आठमुन्ने के हैं ठाठनौ एकन नौआपा लाई जौदस एकन दसअब्बा बोले बस
लिखना पढ़ना कुछ न जानें ठाठ से दफ़्तर जानाहर दिन घर में नए खिलौने लड्डू बर्फ़ी लानाख़ामोश रहो मत धूम मचाओ सब को डाँट पिलानातलो पकौड़े चाय बनाओ ऑर्डर देते जाएँआओ बड़े बन जाएँ
जब आदमी के हाल पे आती है मुफ़्लिसीकिस किस तरह से उस को सताती है मुफ़्लिसीप्यासा तमाम रोज़ बिड़ाती है मुफ़्लिसीभूका तमाम रात सुलाती है मुफ़्लिसीये दुख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़्लिसीकहिए तो अब हकीम की सब से बड़ी है शाँतअ'ज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँमुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँईसा भी हो तो कोई नहीं पूछता मियाँहिकमत हकीम की भी ढुबाती है मुफ़्लिसीजो अहल-ए-फ़ज़्ल आलिम ओ फ़ाज़िल कहाते हैंमुफ़्लिस हुए तो कलमा तलक भूल जाते हैंवो जो ग़रीब-ग़ुरबा के लड़के पढ़ाते हैंउन की तो उम्र भर नहीं जाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस करे जो आन के महफ़िल के बीच हालसब जानें रोटियों का ये डाला है इस ने जालगिर गिर पड़े तो कोई न लिए उसे सँभालमुफ़्लिस में होवें लाख अगर इल्म और कमालसब ख़ाक बेच आ के मिलाती है मुफ़्लिसीजब रोटियों के बटने का आ कर पड़े शुमारमुफ़्लिस को देवें एक तवंगर को चार चारगर और माँगे वो तो उसे झिड़कें बार बारमुफ़्लिस का हाल आह बयाँ क्या करूँ मैं यारमुफ़्लिस को इस जगह भी चबाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस की कुछ नज़र नहीं रहती है आन परदेता है अपनी जान वो एक एक नान परहर आन टूट पड़ता है रोटी के ख़्वान परजिस तरह कुत्ते लड़ते हैं इक उस्तुख़्वान परवैसा ही मुफ़लिसों को लड़ाती है मुफ़्लिसीकरता नहीं हया से जो कोई वो काम आहमुफ़्लिस करे है उस के तईं इंसिराम आहसमझे न कुछ हलाल न जाने हराम आहकहते हैं जिस को शर्म-ओ-हया नंग-ओ-नाम आहवो सब हया-ओ-शर्म उड़ाती है मुफ़्लिसीये मुफ़्लिसी वो शय है कि जिस घर में भर गईफिर जितने घर थे सब में उसी घर के दर गईज़न बच्चे रोते हैं गोया नानी गुज़र गईहम-साया पूछते हैं कि क्या दादी मर गईबिन मुर्दे घर में शोर मचाती है मुफ़्लिसीलाज़िम है गर ग़मी में कोई शोर-ग़ुल मचाएमुफ़्लिस बग़ैर ग़म के ही करता है हाए हाएमर जावे गर कोई तो कहाँ से उसे उठाएइस मुफ़्लिसी की ख़्वारियाँ क्या क्या कहूँ मैं हाएमुर्दे को बे कफ़न के गड़ाती है मुफ़्लिसीक्या क्या मुफ़्लिसी की कहूँ ख़्वारी फकड़ियाँझाड़ू बग़ैर घर में बिखरती हैं झकड़ियाँकोने में जाले लपटे हैं छप्पर में मकड़ियाँपैसा न होवे जिन के जलाने को लकड़ियाँदरिया में उन के मुर्दे बहाती है मुफ़्लिसीबीबी की नथ न लड़कों के हाथों कड़े रहेकपड़े मियाँ के बनिए के घर में पड़े रहेजब कड़ियाँ बिक गईं तो खंडर में पड़े रहेज़ंजीर ने किवाड़ न पत्थर गड़े रहेआख़िर को ईंट ईंट खुदाती है मुफ़्लिसीनक़्क़ाश पर भी ज़ोर जब आ मुफ़्लिसी करेसब रंग दम में कर दे मुसव्विर के किर्किरेसूरत भी उस की देख के मुँह खिंच रहे परेतस्वीर और नक़्श में क्या रंग वो भरेउस के तो मुँह का रंग उड़ाती है मुफ़्लिसीजब ख़ूब-रू पे आन के पड़ता है दिन सियाहफिरता है बोसे देता है हर इक को ख़्वाह-मख़ाहहरगिज़ किसी के दिल को नहीं होती उस की चाहगर हुस्न हो हज़ार रूपे का तो उस को आहक्या कौड़ियों के मोल बिकाती है मुफ़्लिसीउस ख़ूब-रू को कौन दे अब दाम और दिरमजो कौड़ी कौड़ी बोसे को राज़ी हो दम-ब-दमटोपी पुरानी दो तो वो जाने कुलाह-ए-जिस्मक्यूँकर न जी को उस चमन-ए-हुस्न के हो ग़मजिस की बहार मुफ़्त लुटाती है मुफ़्लिसीआशिक़ के हाल पर भी जब आ मुफ़्लिसी पड़ेमाशूक़ अपने पास न दे उस को बैठनेआवे जो रात को तो निकाले वहीं उसेइस डर से या'नी रात ओ धन्ना कहीं न देतोहमत ये आशिक़ों को लगाती है मुफ़्लिसीकैसे ही धूम-धाम की रंडी हो ख़ुश-जमालजब मुफ़्लिसी हो कान पड़े सर पे उस के जालदेते हैं उस के नाच को ढट्ढे के बीच डालनाचे है वो तो फ़र्श के ऊपर क़दम सँभालऔर उस को उँगलियों पे नचाती है मुफ़्लिसीउस का तो दिल ठिकाने नहीं भाव क्या बताएजब हो फटा दुपट्टा तो काहे से मुँह छुपाएले शाम से वो सुब्ह तलक गो कि नाचे गाएऔरों को आठ सात तो वो दो टके ही पाएइस लाज से इसे भी लजाती है मुफ़्लिसीजिस कसबी रंडी का हो हलाकत से दिल हज़ींरखता है उस को जब कोई आ कर तमाश-बींइक पौन पैसे तक भी वो करती नहीं नहींये दुख उसी से पूछिए अब आह जिस के तईंसोहबत में सारी रात जगाती है मुफ़्लिसीवो तो ये समझे दिल में कि ढेला जो पाऊँगीदमड़ी के पान दमड़ी के मिस्सी मँगाऊँगीबाक़ी रही छदाम सो पानी भराऊँगीफिर दिल में सोचती है कि क्या ख़ाक खाऊँगीआख़िर चबीना उस का भुनाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी से होवे कलावंत का दिल उदासफिरता है ले तम्बूरे को हर घर के आस-पासइक पाव सेर आने की दिल में लगा के आसगोरी का वक़्त होवे तो गाता है वो बभासयाँ तक हवास उस के उड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस बियाह बेटी का करता है बोल बोलपैसा कहाँ जो जा के वो लावे जहेज़ मोलजोरू का वो गला कि फूटा हो जैसे ढोलघर की हलाल-ख़ोरी तलक करती है ढिढोलहैबत तमाम उस की उठाती है मुफ़्लिसीबेटे का बियाह हो तो न ब्याही न साथी हैने रौशनी न बाजे की आवाज़ आती हैमाँ पीछे एक मैली चदर ओढ़े जाती हैबेटा बना है दूल्हा तो बावा बराती हैमुफ़्लिस की ये बरात चढ़ाती है मुफ़्लिसीगर ब्याह कर चला है सहर को तो ये बलाशहदार नाना हीजड़ा और भाट मंड-चढ़ाखींचे हुए उसे चले जाते हैं जा-ब-जावो आगे आगे लड़ता हुआ जाता है चलाऔर पीछे थपड़ियों को बजाती है मुफ़्लिसीदरवाज़े पर ज़नाने बजाते हैं तालियाँऔर घर में बैठी डोमनी देती हैं गालियाँमालन गले की हार हो दौड़ी ले डालियाँसक़्क़ा खड़ा सुनाता है बातें रज़ालियाँये ख़्वारी ये ख़राबी दिखाती है मुफ़्लिसीकोई शूम बे-हया कोई बोला निखट्टू हैबेटी ने जाना बाप तो मेरा निखट्टू हैबेटे पुकारते हैं कि बाबा निखट्टू हैबीबी ये दिल मैं कहती है अच्छा निखट्टू हैआख़िर निखट्टू नाम धराती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस का दर्द दिल में कोई ढानता नहींमुफ़्लिस की बात को भी कोई मानता नहींज़ात और हसब-नसब को कोई जानता नहींसूरत भी उस की फिर कोई पहचानता नहींयाँ तक नज़र से उस को गिराती है मुफ़्लिसीजिस वक़्त मुफ़्लिसी से ये आ कर हुआ तबाहफिर कोई इस के हाल प करता नहीं निगाहदालीदरी कहे कोई ठहरा दे रू-सियाहजो बातें उम्र भर न सुनी होवें उस ने आहवो बातें उस को आ के सुनाती हैं मुफ़्लिसीचूल्हा तवाना पानी के मटके में आबी हैपीने को कुछ न खाने को और ने रकाबी हैमुफ़्लिस के साथ सब के तईं बे-हिजाबी हैमुफ़्लिस की जोरू सच है कि याँ सब की भाबी हैइज़्ज़त सब उस के दिल की गंवाती है मुफ़्लिसीकैसा ही आदमी हो पर इफ़्लास के तुफ़ैलकोई गधा कहे उसे ठहरा दे कोई बैलकपड़े फटे तमाम बढ़े बाल फैल फैलमुँह ख़ुश्क दाँत ज़र्द बदन पर जमा है मैलसब शक्ल क़ैदियों की बनाती है मुफ़्लिसीहर आन दोस्तों की मोहब्बत घटाती हैजो आश्ना हैं उन की तो उल्फ़त घटाती हैअपने की मेहर ग़ैर की चाहत घटाती हैशर्म-ओ-हया ओ इज़्ज़त-ओ-हुर्मत घटाती हैहाँ नाख़ुन और बाल बढ़ाती है मुफ़्लिसीजब मुफ़्लिसी हुई तो शराफ़त कहाँ रहीवो क़द्र ज़ात की वो नजाबत कहाँ रहीकपड़े फटे तो लोगों में इज़्ज़त कहाँ रहीतअ'ज़ीम और तवाज़ो' की बाबत कहाँ रहीमज्लिस की जूतियों पे बिड़ाती है मुफ़्लिसीमुफ़्लिस किसी का लड़का जो ले प्यार से उठाबाप उस का देखे हाथ का और पाँव का कड़ाकहता है कोई जूती न लेवे कहीं चुरानट-खट उचक्का चोर दग़ाबाज़ गठ-कटासौ सौ तरह के ऐब लगाती है मुफ़्लिसीरखती नहीं किसी की ये ग़ैरत की आन कोसब ख़ाक में मिलाती है हुर्मत की शान कोसौ मेहनतों में उस की खपाती है जान कोचोरी पे आ के डाले ही मुफ़्लिस के ध्यान कोआख़िर नदान भीक मंगाती है मुफ़्लिसीदुनिया में ले के शाह से ऐ यार ता-फ़क़ीरख़ालिक़ न मुफ़्लिसी में किसी को करे असीरअशराफ़ को बनाती है इक आन में फ़क़ीरक्या क्या मैं मुफ़्लिसी की ख़राबी कहूँ 'नज़ीर'वो जाने जिस के दिल को जलाती है मुफ़्लिसी
जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियाँफूली नहीं बदन में समाती हैं रोटियाँआँखें परी-रुख़ों से लड़ाती हैं रोटियाँसीने उपर भी हाथ चलाती हैं रोटियाँजितने मज़े हैं सब ये दिखाती हैं रोटियाँरोटी से जिस का नाक तलक पेट है भराकरता परे है क्या वो उछल कूद जा-ब-जादीवार फाँद कर कोई कोठा उछल गयाठट्ठा हँसी शराब सनम साक़ी इस सिवासौ सौ तरह की धूम मचाती हैं रोटियाँजिस जा पे हाँडी चूल्हा तवा और तनूर हैख़ालिक़ की क़ुदरतों का उसी जा ज़ुहूर हैचूल्हे के आगे आँच जो चलती हुज़ूर हैजितने हैं नूर सब में यही ख़ास नूर हैइस नूर के सबब नज़र आती हैं रोटियाँआवे तवे तनूर का जिस जा ज़बाँ पे नामया चक्की चूल्हे के जहाँ गुलज़ार हों तमामवाँ सर झुका के कीजे ङंङवत और सलामइस वास्ते कि ख़ास ये रोटी के हैं मक़ामपहले इन्हीं मकानों में आती हैं रोटियाँइन रोटियों के नूर से सब दिल हैं बोर बोरआटा नहीं है छलनी से छन-छन गिरे है नूरपेङ़ा हर एक उस का है बर्फ़ी ओ मोती चूरहरगिज़ किसी तरह न बुझे पेट का तनूरइस आग को मगर ये बुझाती हैं रोटियाँपूछा कसी ने ये किसी कामिल फ़क़ीर सेये मेहर-ओ-माह हक़ ने बनाए हैं काहे केवो सुन के बोला बाबा ख़ुदा तुझ को ख़ैर देहम तो न चाँद समझें न सूरज हैं जानतेबाबा हमें तो ये नज़र आती हैं रोटियाँफिर पूछा उस ने कहिए ये है दिल का तूर क्याइस के मुशाहिदे में है खुलता ज़ुहूर क्यावो बोला सुन के तेरा गया है शुऊ'र क्याकश्फ़-उल-क़ुलूब और ये कश्फ़-उल-क़ुबूर क्याजितने हैं कश्फ़ सब ये दिखाती हैं रोटियाँरोटी जब आई पेट में सौ क़ंद घुल गएगुलज़ार फूले आँखों में और ऐश तुल गएदो तर निवाले पेट में जब आ के ढुल गएचौदह तबक़ के जितने थे सब भेद खुल गएये कश्फ़ ये कमाल दिखाती हैं रोटियाँरोटी न पेट में हो तो फिर कुछ जतन न होमेले की सैर ख़्वाहिश-ए-बाग़-ओ-चमन न होभूके ग़रीब दिल की ख़ुदा से लगन न होसच है कहा कसी ने कि भूके भजन न होअल्लाह की भी याद दिलाती हैं रोटियाँअब आगे जिस के माल-पूए भर के थाल हैंपूरे भगत उन्हें कहो साहब के लाल हैंऔर जिन के आगे रोग़नी और शीर-माल हैंआरिफ़ वही हैं और वही साहब-कमाल हैंपक्की-पकाई अब जिन्हें आती हैं रोटियाँकपड़े किसी के लाल हैं रोटी के वास्तेलम्बे किसी के बाल हैं रोटी के वास्तेबाँधे कोई रुमाल हैं रोटी के वास्तेसब कश्फ़ और कमाल हैं रोटी के वास्तेजितने हैं रूप सब ये दिखाती हैं रोटियाँरोटी से नाचे प्यादा क़वाएद दिखा दिखाअसवार नाचे घोड़े को कावा लगा लगाघुंघरू को बाँधे पैक भी फिरता है नाचताऔर इस सिवा जो ग़ौर से देखा तो जा-ब-जासौ सौ तरह के नाच दिखाती हैं रोटियाँरोटी के नाच तो हैं सभी ख़ल्क़ में पड़ेकुछ भाँड भीगते ये नहीं फिरते नाचतेये रंडियाँ जो नाचे हैं घूँघट को मुँह पे लेघूँघट न जानो दोस्तो तुम ज़ीनहार उसेइस पर्दे में ये अपने कमाती हैं रोटियाँअशराफ़ों ने जो अपनी ये ज़ातें छुपाई हैंसच पूछिए तो अपनी ये शानें बढ़ाई हैंकहिए उन्हों की रोटियाँ किस किस ने खाई हैंअशराफ़ सब में कहिए तो अब नान-बाई हैंजिन की दुकाँ से हर कहीं जाती हैं रोटियाँदुनिया में अब बदी न कहीं और निकोई हैया दुश्मनी ओ दोस्ती या तुंद-ख़ूई हैकोई किसी का और किसी का न कोई हैसब कोई है उसी का कि जिस हाथ डोई हैनौकर नफ़र ग़ुलाम बनाती हैं रोटियाँरोटी का अब अज़ल से हमारा तो है ख़मीररूखी ही रोटी हक़ में हमारे है शहद-ओ-शीरया पतली होवे मोटी ख़मीरी हो या फ़तीरगेहूँ जवार बाजरे की जैसी हो 'नज़ीर'हम को तो सब तरह की ख़ुश आती हैं रोटियाँ
दयार-ए-हिन्द था गहवारा याद है हमदमबहुत ज़माना हुआ किस के किस के बचपन काइसी ज़मीन पे खेला है 'राम' का बचपनइसी ज़मीन पे उन नन्हे नन्हे हाथों नेकिसी समय में धनुष-बान को सँभाला थाइसी दयार ने देखी है 'कृष्ण' की लीलायहीं घरोंदों में सीता सुलोचना राधाकिसी ज़माने में गुड़ियों से खेलती होंगीयही ज़मीं यही दरिया पहाड़ जंगल बाग़यही हवाएँ यही सुब्ह-ओ-शाम सूरज चाँदयही घटाएँ यही बर्क़-ओ-र'अद ओ क़ौस-ए-क़ुज़हयहीं के गीत रिवायात मौसमों के जुलूसहुआ ज़माना कि 'सिद्धार्थ' के थे गहवारेइन्ही नज़ारों में बचपन कटा था 'विक्रम' कासुना है 'भर्तृहरि' भी इन्हीं से खेला था'भरत' 'अगस्त्य' 'कपिल' 'व्यास' 'पाशी' 'कौटिल्य''जनक' 'वशिष्ठ' 'मनु' 'वाल्मीकि' 'विश्वामित्र''कणाद' 'गौतम' ओ 'रामानुज' 'कुमारिल-भट्ट'मोहनजोडारो हड़प्पा के और अजंता केबनाने वाले यहीं बल्लमों से खेले थेइसी हिंडोले में 'भवभूति' ओ 'कालीदास' कभीहुमक हुमक के जो तुतला के गुनगुनाए थेसरस्वती ने ज़बानों को उन की चूमा थायहीं के चाँद व सूरज खिलौने थे उन केइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन पला था 'ख़ुसरव' काइसी ज़मीं से उठे 'तानसेन' और 'अकबर''रहीम' 'नानक' ओ 'चैतन्य' और 'चिश्ती' नेइन्हीं फ़ज़ाओं में बचपन के दिन गुज़ारे थेइसी ज़मीं पे कभी शाहज़ादा-ए-'ख़ुर्रम'ज़रा सी दिल-शिकनी पर जो रो दिया होगाभर आया था दिल-ए-नाज़ुक तो क्या अजब इस मेंइन आँसुओं में झलक ताज की भी देखी हो'अहिल्याबाई' 'दमन' 'पदमिनी' ओ 'रज़िया' नेयहीं के पेड़ों की शाख़ों में डाले थे झूलेइसी फ़ज़ा में बढ़ाई थी पेंग बचपन कीइन्ही नज़ारों में सावन के गीत गाए थेइसी ज़मीन पे घुटनों के बल चले होंगे'मलिक-मोहम्मद' ओ 'रसखान' और 'तुलसी-दास'इन्हीं फ़ज़ाओं में गूँजी थी तोतली बोली'कबीर-दास' 'टुकाराम' 'सूर' ओ 'मीरा' कीइसी हिंडोले में 'विद्यापति' का कंठ खुलाइसी ज़मीन के थे लाल 'मीर' ओ 'ग़ालिब' भीठुमक ठुमक के चले थे घरों के आँगन में'अनीस' ओ 'हाली' ओ 'इक़बाल' और 'वारिस-शाह'यहीं की ख़ाक से उभरे थे 'प्रेमचंद' ओ 'टैगोर'यहीं से उठ्ठे थे तहज़ीब-ए-हिन्द के मेमारइसी ज़मीन ने देखा था बाल-पन इन कायहीं दिखाई थीं इन सब ने बाल-लीलाएँयहीं हर एक के बचपन ने तर्बियत पाईयहीं हर एक के जीवन का बालकांड खुलायहीं से उठते बगूलों के साथ दौड़े हैंयहीं की मस्त घटाओं के साथ झूमे हैंयहीं की मध-भरी बरसात में नहाए हैंलिपट के कीचड़ ओ पानी से बचपने उन केइसी ज़मीन से उठ्ठे वो देश के सावंतउड़ा दिया था जिन्हें कंपनी ने तोपों सेइसी ज़मीन से उठी हैं अन-गिनत नस्लेंपले हैं हिन्द हिंडोले में अन-गिनत बच्चेमुझ ऐसे कितने ही गुमनाम बच्चे खेले हैंइसी ज़मीं से इसी में सुपुर्द-ए-ख़ाक हुएज़मीन-ए-हिन्द अब आराम-गाह है उन कीइस अर्ज़-ए-पाक से उट्ठीं बहुत सी तहज़ीबेंयहीं तुलू हुईं और यहीं ग़ुरूब हुईंइसी ज़मीन से उभरे कई उलूम-ओ-फ़ुनूनफ़राज़-ए-कोह-ए-हिमाला ये दौर-ए-गंग-ओ-जमनऔर इन की गोद में पर्वर्दा कारवानों नेयहीं रुमूज़-ए-ख़िराम-ए-सुकूँ-नुमा सीखेनसीम-ए-सुब्ह-ए-तमद्दुन ने भैरवीं छेड़ीयहीं वतन के तरानों की वो पवें फूटेंवो बे-क़रार सुकूँ-ज़ा तरन्नुम-ए-सहरीवो कपकपाते हुए सोज़-ओ-साज़ के शोलेइन्ही फ़ज़ाओं में अंगड़ाइयाँ जो ले के उठेलवों से जिन के चराग़ाँ हुई थी बज़्म-ए-हयातजिन्हों ने हिन्द की तहज़ीब को ज़माना हुआबहुत से ज़ावियों से आईना दिखाया थाइसी ज़मीं पे ढली है मिरी हयात की शामइसी ज़मीन पे वो सुब्ह मुस्कुराई हैतमाम शोला ओ शबनम मिरी हयात की सुब्हसुनाऊँ आज कहानी मैं अपने बचपन कीदिल-ओ-दिमाग़ की कलियाँ अभी न चटकी थींहमेशा खेलता रहता था भाई बहनों मेंहमारे साथ मोहल्ले की लड़कियाँ लड़केमचाए रखते थे बालक उधम हर एक घड़ीलहू तरंग उछल-फाँद का ये आलम थामोहल्ला सर पे उठाए फिरे जिधर गुज़रेहमारे चहचहे और शोर गूँजते रहतेचहार-सम्त मोहल्ले के गोशे गोशे मेंफ़ज़ा में आज भी ला-रैब गूँजते होंगेअगरचे दूसरे बच्चों की तरह था मैं भीब-ज़ाहिर औरों के बचपन सा था मिरा बचपनये सब सही मिरे बचपन की शख़्सियत भी थी एकवो शख़्सियत कि बहुत शोख़ जिस के थे ख़द-ओ-ख़ालअदा अदा में कोई शान-ए-इन्फ़िरादी थीग़रज़ कुछ और ही लक्षण थे मेरे बचपन केमुझे था छोटे बड़ों से बहुत शदीद लगावहर एक पर मैं छिड़कता था अपनी नन्ही सी जाँदिल उमडा आता था ऐसा कि जी ये चाहता थाउठा के रख लूँ कलेजे में अपनी दुनिया कोमुझे है याद अभी तक कि खेल-कूद में भीकुछ ऐसे वक़्फ़े पुर-असरार आ ही जाते थेकि जिन में सोचने लगता था कुछ मिरा बचपनकई मआनी-ए-बे-लफ़्ज़ छूने लगते थेबुतून-ए-ग़ैब से मेरे शुऊर-ए-असग़र कोहर एक मंज़र-ए-मानूस घर का हर गोशाकिसी तरह की हो घर में सजी हुई हर चीज़मिरे मोहल्ले की गलियाँ मकाँ दर-ओ-दीवारचबूतरे कुएँ कुछ पेड़ झाड़ियाँ बेलेंवो फेरी वाले कई उन के भाँत भाँत के बोलवो जाने बूझे मनाज़िर वो आसमाँ ओ ज़मींबदलते वक़्त का आईना गर्मी-ओ-ख़ुनकीग़ुरूब-ए-महर में रंगों का जागता जादूशफ़क़ के शीश-महल में गुदाज़-ए-पिन्हाँ सेजवाहरों की चटानें सी कुछ पिघलती हुईंशजर हजर की वो कुछ सोचती हुई दुनियासुहानी रात की मानूस रमज़ियत का फ़ुसूँअलस्सबाह उफ़ुक़ की वो थरथराती भवेंकिसी का झाँकना आहिस्ता फूटती पौ सेवो दोपहर का समय दर्जा-ए-तपिश का चढ़ावथकी थकी सी फ़ज़ा में वो ज़िंदगी का उतारहुआ की बंसियाँ बंसवाड़ियों में बजती हुईंवो दिन के बढ़ते हुए साए सह-पहर का सुकूँसुकूत शाम का जब दोनों वक़्त मिलते हैंग़रज़ झलकते हुए सरसरी मनाज़िर परमुझे गुमान परिस्तानियत का होता थाहर एक चीज़ की वो ख़्वाब-नाक अस्लिय्यतमिरे शुऊर की चिलमन से झाँकता था कोईलिए रुबूबियत-ए-काएनात का एहसासहर एक जल्वे में ग़ैब ओ शुहूद का वो मिलापहर इक नज़ारा इक आईना-ख़ाना-ए-हैरतहर एक मंज़र-ए-मानूस एक हैरत-ज़ारकहीं रहूँ कहीं खेलों कहीं पढ़ूँ लिखूँमिरे शुऊर पे मंडलाते थे मनाज़िर-ए-दहरमैं अक्सर उन के तसव्वुर में डूब जाता थावफ़ूर-ए-जज़्बा से हो जाती थी मिज़ा पुर-नममुझे यक़ीन है इन उन्सुरी मनाज़िर सेकि आम बच्चों से लेता था मैं ज़ियादा असरकिसी समय मिरी तिफ़्ली रही न बे-परवान छू सकी मिरी तिफ़्ली को ग़फ़लत-ए-तिफ़्लीये खेल-कूद के लम्हों में होता था एहसासदुआएँ देता हो जैसे मुझे सुकूत-ए-दवामकि जैसे हाथ अबद रख दे दोश-ए-तिफ़्ली परहर एक लम्हा के रख़नों से झाँकती सदियाँकहानियाँ जो सुनूँ उन में डूब जाता थाकि आदमी के लिए आदमी की जग-बीतीसे बढ़ के कौन सी शय और हो ही सकती हैइन्ही फ़सानों में पिन्हाँ थे ज़िंदगी के रुमूज़इन्ही फ़सानों में खुलते थे राज़-हा-ए-हयातउन्हें फ़सानों में मिलती थीं ज़ीस्त की क़द्रेंरुमूज़-ए-बेश-बहा ठेठ आदमियत केकहानियाँ थीं कि सद-दर्स-गाह-ए-रिक़्क़त-ए-क़ल्बहर इक कहानी में शाइस्तगी-ए-ग़म का सबक़वो उंसुर आँसुओं का दास्तान-ए-इंसाँ मेंवो नल-दमन की कथा सरगुज़श्त-ए-सावित्री'शकुन्तला' की कहानी 'भरत' की क़ुर्बानीवो मर्ग-ए-भीष्म-पितामह वो सेज तीरों कीवो पांचों पांडव की स्वर्ग-यात्रा की कथावतन से रुख़्सत-ए-'सिद्धार्थ' 'राम' का बन-बासवफ़ा के ब'अद भी 'सीता' की वो जिला-वतनीवो रातों-रात 'सिरी-कृष्ण' को उठाए हुएबला की क़ैद से 'बसदेव' का निकल जानावो अंधकार वो बारिश, बढ़ी हुई जमुनाग़म-ए-आफ़रीन कहानी वो 'हीर' 'राँझा' कीशुऊर-ए-हिन्द के बचपन की यादगार-ए-अज़ीमकि ऐसे वैसे तख़य्युल की साँस उखड़ जाएकई मुहय्युर-ए-इदराक देव-मालाएँहितोपदेश के क़िस्से कथा सरत-सागरकरोड़ों सीनों में वो गूँजता हुआ आल्हामैं पूछता हूँ किसी और मलक वालों सेकहानियों की ये दौलत ये बे-बहा दौलतफ़साने देख लो इन के नज़र भी आती हैमैं पूछता हूँ कि गहवारे और क़ौमों केबसे हुए हैं कहीं ऐसी दास्तानों सेकहानियाँ जो मैं सुनता था अपने बचपन मेंमिरे लिए वो न थीं महज़ बाइस-ए-तफ़रीहफ़सानों से मिरे बचपन ने सोचना सीखाफ़सानों से मुझे संजीदगी के दर्स मिलेफ़सानों में नज़र आती थी मुझ को ये दुनियाग़म ओ ख़ुशी में रची प्यार में बसाई हुईफ़सानों से मिरे दिल ने घुलावटें पाईंयही नहीं कि मशाहीर ही के अफ़्सानेज़रा सी उम्र में करते हों मुझ को मुतअस्सिरमोहल्ले टोले के गुमनाम आदमिय्यों केकुछ ऐसे सुनने में आते थे वाक़िआत-ए-हयातजों यूँ तो होते थे फ़र्सूदा और मामूलीमगर थे आईने इख़्लास और शराफ़त केये चंद आई गई बातें ऐसी बातें थींकि जिन की ओट चमकता था दर्द-ए-इंसानीये वारदात नहीं रज़्मिय्ये हयात के थेग़रज़ कि ये हैं मिरे बचपने की तस्वीरेंनदीम और भी कुछ ख़त्त-ओ-ख़ाल हैं उन केये मेरी माँ का है कहना कि जब मैं बच्चा थामैं ऐसे आदमी की गोद में न जाता थाजो बद-क़िमार हो एेबी हो या हो बद-सूरतमुझे भी याद है नौ दस बरस ही का मैं थातो मुझ पे करता था जादू सा हुस्न-ए-इंसानीकुछ ऐसा होता था महसूस जब मैं देखता थाशगुफ़्ता रंग तर-ओ-ताज़ा रूप वालों काकि उन की आँच मिरी हड्डियाँ गला देगीइक आज़माइश-ए-जाँ थी कि था शुऊर-ए-जमालऔर उस की नश्तरिय्यत उस की उस्तुखाँ-सोज़ीग़म ओ नशात लगावट मोहब्बत ओ नफ़रतइक इंतिशार-ए-सकूँ इज़्तिराब प्यार इताबवो बे-पनाह ज़की-उल-हिसी वो हिल्म ओ ग़ुरूरकभी कभी वो भरे घर में हिस्स-ए-तंहाईवो वहशतें मिरी माहौल-ए-ख़ुश-गवार में भीमिरी सरिश्त में ज़िद्दैन के कई जोड़ेशुरूअ ही से थे मौजूद आब-ओ-ताब के साथमिरे मिज़ाज में पिन्हाँ थी एक जदलिय्यतरगों में छूटते रहते थे बे-शुमार अनारनदीम ये हैं मिरे बाल-पन के कुछ आसारवफ़ूर ओ शिद्दत-ए-जज़्बात का ये आलम थाकि कौंदे जस्त करें दिल के आबगीने मेंवो बचपना जिसे बर्दाश्त अपनी मुश्किल होवो बचपना जो ख़ुद अपनी ही तेवरियाँ सी चढ़ाएनदीम ज़िक्र-ए-जवानी से काँप जाता हूँजवानी आई दबे पाँव और यूँ आईकि उस के आते ही बिगड़ा बना-बनाया खेलवो ख़्वाहिशात के जज़्बात के उमडते हुएवो होंकते हुए बे-नाम आग के तूफ़ाँवो फूटता हुआ ज्वाला-मुखी जवानी कारगों में उठती हुई आँधियों के वो झटकेकि जो तवाज़ुन-ए-हस्ती झिंझोड़ के रख देंवो ज़लज़ले कि पहाड़ों के पैर उखड़ जाएँबुलूग़ियत की वो टीसें वो कर्ब-ए-नश्व-ओ-नुमाऔर ऐसे में मुझे ब्याहा गया भला किस सेजो हो न सकती थी हरगिज़ मिरी शरीक-ए-हयातहम एक दूसरे के वास्ते बने ही न थेसियाह हो गई दुनिया मिरी निगाहों मेंवो जिस को कहते हैं शादी-ए-ख़ाना-आबादीमिरे लिए वो बनी बेवगी जवानी कीलुटा सुहाग मिरी ज़िंदगी का मांडो मेंनदीम खा गई मुझ को नज़र जवानी कीबला-ए-जान मुझे हो गया शुऊर-ए-जमालतलाश-ए-शोला-ए-उलफ़त से ये हुआ हासिलकि नफ़रतों का अगन-कुंड बन गई हस्तीवो हल्क़ ओ सीना ओ रग रग में बे-पनाह चुभानदीम जैसे निगल ली हो मैं ने नाग-फनीज़ इश्क़-ज़ादम ओ इशक़म कमुश्त ज़ार-ओ-दरेग़ख़बर न बुर्द ब-रुस्तम कसे कि सोहरा-बमन पूछ आलम-ए-काम-ओ-दहन नदीम मिरेसमर हयात का जब राख बिन गया मुँह मेंमैं चलती-फिरती चिता बन गया जवानी कीमैं कांधा देता रहा अपने जीते मुर्दे कोये सोचता था कि अब क्या करूँ कहाँ जाऊँबहुत से और मसाइब भी मुझ पे टूट पड़ेमैं ढूँढने लगा हर सम्त सच्ची झूटी पनाहतलाश-ए-हुस्न में शेर-ओ-अदब में दोस्ती मेंरुँधी सदा से मोहब्बत की भीक माँगी हैनए सिरे से समझना पड़ा है दुनिया कोबड़े जतन से सँभाला है ख़ुद को मैं ने नदीममुझे सँभलने में तो चालीस साल गुज़रे हैंमेरी हयात तो विश-पान की कथा है नदीममैं ज़हर पी के ज़माने को दे सका अमृतन पूछ मैं ने जो ज़हराबा-ए-हयात पियामगर हूँ दिल से मैं इस के लिए सिपास-गुज़ारलरज़ते हाथों से दामन ख़ुलूस का न छटाबचा के रक्खी थी मैं ने अमानत-ए-तिफ़्लीइसे न छीन सकी मुझ से दस्त-बुर्द-ए-शबाबब-क़ौल शाएर-ए-मुल्क-ए-फ़रंग हर बच्चाख़ुद अपने अहद-ए-जवानी का बाप होता हैये कम नहीं है कि तिफ़्ली-ए-रफ़्ता छोड़ गईदिल-ए-हज़ीं में कई छोटे छोटे नक़्श-ए-क़दममिरी अना की रगों में पड़े हुए हैं अभीन जाने कितने बहुत नर्म उँगलियों के निशाँहनूज़ वक़्त के बे-दर्द हाथ कर न सकेहयात-ए-रफ़्ता की ज़िंदा निशानियों को फ़नाज़माना छीन सकेगा न मेरी फ़ितरत सेमिरी सफ़ा मिरे तहतुश-शुऊर की इस्मततख़य्युलात की दोशीज़गी का रद्द-ए-अमलजवान हो के भी बे-लौस तिफ़ल-वश जज़्बातस्याना होने पे भी ये जिबिल्लतें मेरीये सरख़ुशी ओ ग़म बे-रिया ये क़ल्ब-गुदाज़बग़ैर बैर के अन-बन ग़रज़ से पाक तपाकग़रज़ से पाक ये आँसू ग़रज़ से पाक हँसीये दश्त-ए-दहर में हमदर्दियों का सरचश्माक़ुबूलियत का ये जज़्बा ये काएनात ओ हयातइस अर्ज़-ए-पाक पर ईमान ये हम-आहंगीहर आदमी से हर इक ख़्वाब ओ ज़ीस्त से ये लगावये माँ की गोद का एहसास सब मनाज़िर मेंक़रीब ओ दूर ज़मीं में ये बू-ए-वतनिय्यतनिज़ाम-ए-शमस-ओ-क़मर में पयाम-ए-हिफ़्ज़-ए-हयातब-चश्म-ए-शाम-ओ-सहर मामता की शबनम सीये साज़ ओ दिल में मिरे नग़्मा-ए-अनलकौनैनहर इज़्तिराब में रूह-ए-सुकून-ए-बे-पायाँज़माना-ए-गुज़राँ में दवाम का सरगमये बज़्म-ए-जश्न-ए-हयात-ओ-ममात सजती हुईकिसी की याद की शहनाइयाँ सी बजती हुईये रमज़ीत के अनासिर शुऊर-ए-पुख़्ता मेंफ़लक पे वज्द में लाती है जो फ़रिश्तों कोवो शाएरी भी बुलूग़-ए-मिज़ाज-ए-तिफ़्ली हैये नश्तरिय्यत-ए-हस्ती ये इस की शेरियतये पत्ती पत्ती पे गुलज़ार-ए-ज़िंदगी के किसीलतीफ़ नूर की परछाइयाँ सी पड़ती हुईबहम ये हैरत ओ मानूसियत की सरगोशीबशर की ज़ात कि महर-ए-उलूहियत ब-जबींअबद के दिल में जड़ें मारता हुआ सब्ज़ाग़म-ए-जहाँ मुझे आँखें दिखा नहीं सकताकि आँखें देखे हुए हूँ मैं ने अपने बचपन कीमिरे लहू में अभी तक सुनाई देती हैंसुकूत-ए-हुज़्न में भी घुंघरुओं की झंकारेंये और बात कि मैं इस पे कान दे न सकूँइसी वदीअत-ए-तिफ़्ली का अब सहारा हैयही हैं मर्हम-ए-काफ़ूर दिल के ज़ख़्मों परउन्ही को रखना है महफ़ूज़ ता-दम-ए-आख़िरज़मीन-ए-हिन्द है गहवारा आज भी हमदमअगर हिसाब करें दस करोड़ बच्चों काये बच्चे हिन्द की सब से बड़ी अमानत हैंहर एक बच्चे में हैं सद-जहान-ए-इम्कानातमगर वतन का हल-ओ-अक़्द जिन के हाथ में हैनिज़ाम-ए-ज़िंदगी-ए-हिंद जिन के बस में हैरवय्या देख के उन का ये कहना पड़ता हैकिसे पड़ी है कि समझे वो इस अमानत कोकिसे पड़ी है कि बच्चों की ज़िंदगी को बचाएख़राब होने से टलने से सूख जाने सेबचाए कौन इन आज़ुर्दा होनहारों कोवो ज़िंदगी जिसे ये दे रहे हैं भारत कोकरोड़ों बच्चों के मिटने का इक अलमिय्या हैचुराए जाते हैं बच्चे अभी घरों से यहाँकि जिस्म तोड़ दिए जाएँ उन के ताकि मिलेचुराने वालों को ख़ैरात माघ-मेले कीजो इस अज़ाब से बच जाएँ तो गले पड़ जाएँवो लानतें कि हमारे करोड़ों बच्चों कीनदीम ख़ैर से मिट्टी ख़राब हो जाएवो मुफ़्लिसी कि ख़ुशी छीन ले वो बे-बरगीउदासियों से भरी ज़िंदगी की बे-रंगीवो यासियात न जिस को छुए शुआ-ए-उमीदवो आँखें देखती हैं हर तरफ़ जो बे-नूरीवो टुकटुकी कि जो पथरा के रह गई हो नदीमवो बे-दिली की हँसी छीन ले जो होंटों सेवो दुख कि जिस से सितारों की आँख भर आएवो गंदगी वो कसाफ़त मरज़-ज़दा पैकरवो बच्चे छिन गए हों जिन से बचपने उन केहमीं ने घोंट दिया जिस के बचपने का गलाजो खाते-पीते घरों के हैं बच्चे उन को भी क्यासमाज फूलने-फलने के दे सका साधनवो साँस लेते हैं तहज़ीब-कुश फ़ज़ाओं मेंहम उन को देते हैं बे-जान और ग़लत तालीममिलेगा इल्म-ए-जिहालत-नुमा से क्या उन कोनिकल के मदरसों और यूनीवर्सिटिय्यों सेये बद-नसीब न घर के न घाट के होंगेमैं पूछता हूँ ये तालीम है कि मक्कारीकरोड़ों ज़िंदगियों से ये बे-पनाह दग़ानिसाब ऐसा कि मेहनत करें अगर इस परबजाए इल्म जहालत का इकतिसाब करेंये उल्टा दर्स-ए-अदब ये सड़ी हुई तालीमदिमाग़ की हो ग़िज़ा या ग़िज़ा-ए-जिस्मानीहर इक तरह की ग़िज़ा में यहाँ मिलावट हैवो जिस को बच्चों की तालीम कह के देते हैंवो दर्स उल्टी छुरी है गले पे बचपन केज़मीन-ए-हिन्द हिण्डोला नहीं है बच्चों काकरोड़ों बच्चों का ये देस अब जनाज़ा हैहम इंक़लाब के ख़तरों से ख़ूब वाक़िफ़ हैंकुछ और रोज़ यही रह गए जो लैल-ओ-नहारतो मोल लेना पड़ेगा हमें ये ख़तरा भीकि बच्चे क़ौम की सब से बड़ी अमानत हैं
इक परिंदा किसी इक पेड़ की टहनी पे चहकता है कहींएक गाता हुआ यूँ जाता है धरती से फ़लक की जानिबपूरी क़ुव्वत से कोई गेंद उछाले जैसेइक फुदकता है सर-ए-शाख़ पे जिस तरह कोईआमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी की ख़ुशी में नाचेगूँदनी बोझ से अपने ही झुकी पड़ती हैनाज़नीं जैसे है कोई ये भरी महफ़िल मेंऔर कल हाथ हुए हैं पीलेकोयलें कूकती हैंजामुनें पक्की हैं, आमों पे बहार आई हैअरग़नूँ बजता है यकजाई कानीम के पेड़ों में झूले हैं जिधर देखो उधरसावनी गाती हैं सब लड़कियाँ आवाज़ मिला कर हर-सूऔर इस आवाज़ से गूँज उट्ठी है बस्ती सारीमैं कभी एक कभी दूसरे झूले के क़रीं जाता हूँएक ही कम है, वही चेहरा नहींआख़िरश पूछ ही लेता हूँ किसी से बढ़ करक्यूँ हबीबा नहीं आई अब तक?खिलखिला पड़ती हैं सब लड़कियाँ सुन कर ये नामलो ये सपने में हैं, इक कहती हैबाओली सपना नहीं, शहर से आए हैं अभीदूसरी टोकती हैबात से बात निकल चलती हैठाट की आई थी बारात, चम्बेली ने कहाबैंड-बाजा भी था, दीपा बोलीऔर दुल्हन पे हुआ कितना बिखेरकुछ न कुछ कहती रहीं सब ही मगर मैं ने सिर्फ़इतना पूछा वो नदी बहती है अब भी, कि नहींजिस से वाबस्ता हैं हम और ये बस्ती सारी?क्यूँ नहीं बहती, चम्बेली ने कहाऔर वो बरगद का घना पेड़ किनारे उस के?वो भी क़ाएम है अभी तक यूँहीवादा कर के जो 'हबीबा' नहीं आती थी कभीआँखें धोता था नदी में जाकरऔर बरगद की घनी छाँव में सो जाता था
ये है मिल वाला वो बनिया है ये साहूकार हैये है दूकाँ-दार वो है वेद ये अत्तार हैवो अगर ठग है तो ये डाकू है वो बट-मार हैआज हर गर्दन में काली जीत का इक हार है
अल्फ़ाज़ों का एक ख़ज़ाना मेरे पासऔर ख़्वाबों की एक पिटारी तेरे पासमैं तेरे ख़्वाबों का कोई नाम धरूँतुम मेरे लफ़्ज़ों मेंख़्वाब पिरो देनाताकि हम इस लेन-देन मेंभूल सकेंतन्हाई में चुपके चुपके रो देनामैं ने तेरे एक ख़्वाब को बचपन लिखाजिस में तुम ने ख़ुद कोबढ़िया पाया थाऔर कोई तुम से भी इक दोसाल बड़ाचंद बताशे तेरी ख़ातिर लाया थामैं ने एक ख़्वाब को लिखा जवानीजिस में तुम इक तीन साल की बच्ची थीजिस्म ज़ेहन से कच्ची थीसच्ची थीठेठ झूट की जेठ झूट कीशिखर दो-पहरीजिस्म ज़ेहन को दुनिया पुख़्ता करती हैपता है मुझ को नींद में तेरीअब तक मीलोंनन्ही बच्ची ठुमक ठुमक कर चलती हैफिर आता है एक महीना नज़्मों कानाक कान को बेधने वालीरस्मों काऔर बुढ़ापा यहाँ से शुरूअ'नहीं होता
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