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नज़्म
ज़रा सी ठेस से भी शीशा-ए-दिल टूट जाता है
बहुत नाज़ुक मगर अज़-क़िस्म इस्तिहकाम है उर्दू
माजिद-अल-बाक़री
नज़्म
बस चली जा रही है उम्र-ए-गुरेज़ाँ की तरह
ठस के बैठे हैं मुसाफ़िर सफ़-ए-मिज़्गाँ की तरह
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
समाते हैं फिर उस में ठस के यूँ बे-लुत्फ़-ओ-आसाइश
नहीं रहती है नालों के निकलने की भी गुंजाइश