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नज़्म
तिरे माथे का टीका मर्द की क़िस्मत का तारा है
अगर तू साज़-ए-बेदारी उठा लेती तो अच्छा था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
लब-ए-लालीं पे लाखा है न रुख़्सारों पे ग़ाज़ा है
जबीं-ए-नूर-अफ़्शाँ पर न झूमर है न टीका है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
आँखों में भी चितवन में भी चाँद ही चाँद झलकते हैं
चाँद ही टीका चाँद ही झूमर चेहरा चाँद और माथा चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
तीखी नज़रें हों तुर्श अबरू-ए-ख़मदार रहें
बन पड़े जैसे भी दिल सीनों में बेदार रहें
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
उस खींचा-खींच घसीटी पर भड़वे रंडी का फक्कड़ हो
माजून, शराबें, नाच, मज़ा, और टिकिया सुल्फ़ा कक्कड़ हो