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नज़्म
शौकत-ए-जाह-ओ-हशम है मंज़िल-ए-मक़्सूद है
अपने बंदों की हक़ीक़त तुझ से कब मफ़क़ूद है
टीका राम सुख़न
नज़्म
ख़मोशियों में यहाँ एक हश्र बरपा है
कहाँ से ढूँड के लम्हात-ए-पुर-सुकूँ लाएँ
ख्वाजा मंज़र हसन मंज़र
नज़्म
रोज़ ओ शब बैन करती हैं दहलीज़ पर और ज़ंजीर-ए-दर मुझ से खुलती नहीं
फ़र्श-ए-हमवार पर पाँव चलता नहीं
अख़्तर हुसैन जाफ़री
नज़्म
शबाब अपने जलाल-ए-हश्र-सामाँ की क़सम खाता
शराफ़त बे-ज़बाँ फ़ितरत के दुख की चारागर होती
शफ़ीक़ फातिमा शेरा
नज़्म
कभी कभी दिल ये सोचता है
न जाने हम बे-यक़ीन लोगों को नाम-ए-हैदर से रब्त क्यूँ है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
गुज़िश्ता अज़्मतों के तज़्किरे भी रह न जाएँगे
किताबों ही में दफ़्न अफ़्साना-ए-जाह-ओ-हशम होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
टूट कर बिखरे जो आग़ाज़-ए-जहाँ में रेज़े
साअ'त-ए-हश्र के आने पे ही यकजा होंगे