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नज़्म
गुज़िश्ता अज़्मतों के तज़्किरे भी रह न जाएँगे
किताबों ही में दफ़्न अफ़्साना-ए-जाह-ओ-हशम होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
शौकत-ए-जाह-ओ-हशम है मंज़िल-ए-मक़्सूद है
अपने बंदों की हक़ीक़त तुझ से कब मफ़क़ूद है
टीका राम सुख़न
नज़्म
जहान-ए-शौक़ का अफ़्साना-ए-जाह-ओ-हशम भी हैं
करिश्मा है ख़ुदा का आप के औसाफ़ के क़ाइल
मसूद अख़्तर जमाल
नज़्म
ता-रोज़-ए-हश्र अहल-ए-वतन को रहेंगे याद
हिन्दोस्ताँ की फ़ौज-ए-ज़फ़र-मौज ज़िंदाबाद
तिलोकचंद महरूम
नज़्म
टूट कर बिखरे जो आग़ाज़-ए-जहाँ में रेज़े
साअ'त-ए-हश्र के आने पे ही यकजा होंगे
मोहम्मद ओवैस मालिक
नज़्म
कभी कभी दिल ये सोचता है
न जाने हम बे-यक़ीन लोगों को नाम-ए-हैदर से रब्त क्यूँ है