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नज़्म
वो साँवले-पन पर मैदाँ के हल्की सी सबाहत दौड़ चली
थोड़ा सा उभर कर बादल से वो चाँद जबीं झलकाने लगा
जोश मलीहाबादी
नज़्म
गए वो दिन कि जब कुछ लोग ही इस को समझते थे
ज़बानों में उभर आई है तश्त-अज़-बाम है उर्दू