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नज़्म
ये हिन्दियों की फ़िक्र-ए-फ़लक-रस का है असर
रिफ़अत में आसमाँ से भी ऊँचा है बाम-ए-हिंद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दिलों में अहल-ए-ज़मीं के है नीव उस की मगर
क़ुसूर-ए-ख़ुल्द से ऊँचा है बाम-ए-आज़ादी
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
बैठे हैं कितने ख़ुश हो ऊँचे छुआ के बंगले
पीते हैं मय के प्याले और देखते हैं जंगले
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जो ऊपर ऊँचा बोल करे तो उस का बोल भी बाला है
और दे पटके तो उस को भी कोई और पटकने वाला है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
निशाँ हैं गोलियों के या खिले हैं फूल सीने पर
उसी को मार डाला जिस ने सर ऊँचा किया सब का
नज़ीर बनारसी
नज़्म
सारे जग के पहाड़ों में बे-मिस्ल पहाड़ हिमाला है
पर्बत सब से ऊँचा है ये पर्बत सब से निराला है