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नज़्म
असग़र हसन मुजीबी
नज़्म
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
बड़ी शोख़ थी बड़ी तेज़-रौ
बड़ा चहचहाती थी मुस्कुराती थी
उस के पंखों में कोई दाम-ए-विसाल था
याह्या ख़ान यूसुफ़ ज़ई
नज़्म
वो कितना ख़ुश-ख़िसाल था
वो कितना ख़ुश-जमाल था
जिलौ में अपने जो लिए था
लम्हा-ए-विसाल था
सईदुल ज़फर चुग़ताई
नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
हाँ लूटना है आज इसे दौलत-ए-विसाल
'बासित' है किस अदा से सना-ख़्वान-ए-सुब्ह-ए-ईद