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नज़्म
सुख़न यानी लबों का फ़न सुख़न-वर यानी इक पुर-फ़न
सुख़न-वर ईज़द अच्छा था कि आदम या फिर अहरीमन
जौन एलिया
नज़्म
अब मैं अल्ताफ़ ओ इनायत का सज़ा-वार नहीं
मैं वफ़ादार नहीं हाँ मैं वफ़ादार नहीं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तेरे फ़िरदौस-ए-तख़य्युल से है क़ुदरत की बहार
तेरी किश्त-ए-फ़िक्र से उगते हैं आलम सब्ज़ा-वार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
गर फ़िक्र-ए-ज़ख्म की तो ख़ता-वार हैं कि हम
क्यूँ महव-ए-मद्ह-ए-खूबी-ए-तेग़-ए-अदा न थे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
वो सितारे जिन की ख़ातिर कई बे-क़रार सदियाँ
मिरी तीरा-बख़्त दुनिया में सितारा-वार जागीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मुझ को ये ज़िद है कि मैं सर न झुकाऊँगा कभी
मुझ को इसरार कि जीने का सज़ा-वार हूँ मैं
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
जुस्तुजू में मंज़िल-ए-मक़्सूद की दीवाना-वार
अपना सर धुनती फ़ज़ा में बाल बिखराती हुई