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नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
वो जान कि जिस से जी ग़श हो सौ नाज़ से आ झनकारी हो
दिल देख 'नज़ीर' उस की छब को हर आन अदा पर वारी हो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
हमारी जवाँ-मर्दी इक सूबा-जाती तअस्सुब से
या फ़िरक़ा-वारी फ़सादात से आगे कुछ भी नहीं है
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
महज़ ख़ूब-सूरत औरत कभी न लुभा सकी मुझे
न ही मुतअस्सिर कर सकी मुझे कम-शक्ल दानिश-वरी
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
मेरी नानी अच्छी नानी मुझ पर वारी जाती थी
मेरे लाल को आवे निन्दिया हौले-हौले गाती थी