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नज़्म
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
हुस्न हो जाएगा जब औरों का वक़्फ़-ए-ख़ास-ओ-आम
दीदनी होगा तिरे ख़ल्वत-कदे का एहतिमाम
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ये ज़माना कैसा बदल गया न वो वलवले न वो हौसले
किसी वक़्त थे जो सनम-शिकन वो हैं आज वक़्फ़-ए-सनम-गिरी
अमजद नजमी
नज़्म
मोहम्मद तन्वीरुज़्ज़मां
नज़्म
वो फ़लसफ़े जो हर इक आस्ताँ के दुश्मन थे
अमल में आए तो ख़ुद वक़्फ़-ए-आस्ताँ निकले
साहिर लुधियानवी
नज़्म
होश में आ ख़्वाब से बेदार हो ऐ वक़्फ़-ए-नौम
मुल्क पर तेरे हुकूमत कर रही है ग़ैर क़ौम
शातिर हकीमी
नज़्म
अंजुम ख़लीक़
नज़्म
क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ