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नज़्म
रेज़ा रेज़ा हो गए मेरी तरह कितने वजूद
अब नहीं मुमकिन किसी सहरा में मजनूँ का वरूद
चन्द्रभान ख़याल
नज़्म
अपनी ख़ाकिस्तर समुंदर को है सामान-ए-वजूद
मर के फिर होता है पैदा ये जहान-ए-पीर देख
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हुस्न-ए-अज़ल की है नुमूद चाक है पर्दा-ए-वजूद
दिल के लिए हज़ार सूद एक निगाह का ज़ियाँ!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वजूद-ए-ज़न से है तस्वीर-ए-काएनात में रंग
उसी के साज़ से है ज़िंदगी का सोज़-ए-दरूँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वजूद अपना मुझे दे दो मोहब्बत बख़्श दो इक दिन
मिरे होंटों पे अपने होंट रख कर रूह मेरी खींच लो इक दिन