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नज़्म
हम भी आज़ाद वतन को कभी देखें 'साबिर'
ये दुआ विर्द-ए-ज़बाँ शाम-ओ-सहर रखते हैं
सरदार नौबहार सिंह साबिर टोहानी
नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
तुम्हें सुनता हूँ
तो मुझ को क़दीमी मंदिरों से घंटियों और मस्जिदों से विर्द की आवाज़ आती है
रहमान फ़ारिस
नज़्म
तमाम आयात-ए-क़ुर्आनी, वज़ीफ़े और मुनाजातें
कि जिन के विर्द से सारी बलाएँ दूर रहती हैं
शहनाज़ परवीन शाज़ी
नज़्म
बुज़ुर्गों से विर्से में हम को मिले थे
उन्हें पढ़ के हम सब ये महसूस करने लगे