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नज़्म
हम हैं सीमाब-सिफ़त हक़्क़-ओ-सदाक़त की नवीद
मा'बद-ए-ज़ुल्म में नेकी के सनम ढलते हैं
नूर-ए-शमा नूर
नज़्म
हल्क़ा-ए-ज़ुल्फ़-ए-सनम की तीरगी से दूर हूँ
ज़िंदगी के पेच-ओ-ख़म सुलझा रहा हूँ आज-कल
मासूम शर्क़ी
नज़्म
सुना है हो भी चुका है फ़िराक़-ए-ज़ुल्मत-ओ-नूर
सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
फिर लहू बहने लगा आँखों से क्या फिर छिड़ गया
हल्क़ा-ए-अहबाब में ज़िक्र-ए-विसाल-ए-'आरज़ू'
मासूम शर्क़ी
नज़्म
तमाम कूज़े बनते बनते 'तू' ही बन के रह गए
नशात इस विसाल-ए-रह-गुज़र की ना-गहाँ मुझे निगल गई
नून मीम राशिद
नज़्म
आख़िरी हिचकी में दीदार-ए-सनम हो तो कहीं नज़्म बने
उजड़े आँगन के अहाते में तेरी आमद हो