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नज़्म
ऐ मेरे वतन के फ़नकारो ज़ुल्मत पे न अपना फ़न वारो
ये महल-सराओं के बासी क़ातिल हैं सभी अपने यारो
हबीब जालिब
नज़्म
मग़रिब के चेहरे पर यारो अपने ख़ून की लाली है
लेकिन अब उस के सूरज की नाव डूबने वाली है
हबीब जालिब
नज़्म
सब जान के सपने देखते हैं सब जान के धोके खाते हैं
ये दीवाने सादा ही सही पर इतने भी सादा नहीं यारो
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
आवारा आवारा फिरना छोड़ के मंडली यारों की
देख रहे हैं देखने वाले 'इंशा' का अब हाल वही
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
सर-ए-दरिया परस्तिश हो रही है फिर गुनाहों की
करो यारो शुमार-ए-नाला-ए-शब-गीर बिस्मिल्लाह
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ख़ूबियाँ पैसे की ऐ यारो कहूँ मैं क्या क्या
दिल अगर संग से भी उस का ज़ियादा था कड़ा