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नज़्म
उसे हम ज़ाइचा कहते थे तुम तस्वीर कहते थे
तुम्हारे उन दिनों की जब तुम्हारे दिल में नीला आसमाँ होगा
बलराज कोमल
नज़्म
कुछ इस तरह से दफ़्न कर दे ज़ाइचा फ़क़ीर का
कोई न ढूँढ़ पाए फिर निशान-ए-पा फ़क़ीर का
अब्दुर्राहमान वासिफ़
नज़्म
क़फ़स का दर खुला इक नीम-जाँ कम-सिन
परिंदा चंद ख़स्ता ज़ाइचों पर रक़्स के अंदाज़ में आगे
बलराज कोमल
नज़्म
हमेशा से बपा इक जंग है हम उस में क़ाएम हैं
हमारी जंग ख़ैर ओ शर के बिस्तर की है ज़ाईदा
जौन एलिया
नज़्म
परवीन शाकिर
नज़्म
सुकून-ए-ख़ाब है बे-दस्त-ओ-पा ज़ईफ़ी का
तू इज़्तिराब है ख़ुद इज़्तिराब पैदा कर