aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "zab.h"
ज़िंदगी कहने को बे-माया सहीग़म का सरमाया सहीमैं ने इस के लिए क्या क्या न कियाकभी आसानी से इक साँस भी यमराज को अपना न दियाआज से पहले बहुत पहलेइसी आँगन मेंधूप-भरे दामन मेंमैं खड़ा था मिरे तलवों से धुआँ उठता थाएक बे-नाम सा बे-रंग सा ख़ौफ़कच्चे एहसास पे छाया था कि जल जाऊँगामैं पिघल जाऊँगाऔर पिघल कर मिरा कमज़ोर सा ''मैं''क़तरा क़तरा मिरे माथे से टपक जाएगारो रहा था मगर अश्कों के बग़ैरचीख़ता था मगर आवाज़ न थीमौत लहराती थी सौ शक्लों मेंमैं ने हर शक्ल को घबरा के ख़ुदा मान लियाकाट के रख दिए संदल के पुर-असरार दरख़्तऔर पत्थर से निकाला शोलाऔर रौशन किया अपने से बड़ा एक अलावजानवर ज़ब्ह किए इतने कि ख़ूँ की लहरेंपाँव से उठ के कमर तक आईंऔर कमर से मिरे सर तक आईं
हवन हो रहे हैंयज्ञ के मंत्रों की सदाआग में जलने वाली सामग्री की बहुत तेज़ बूहर तरफ़ फैल कर बस गई है हवा मेंऔर वावैन की क़ैद में जो ख़ुदा हैला-मकाँ सेजो होता है होता रहेगाबैठा चुप-चाप सब देखता हैहम भी क्यूँ न ख़ुदा की तरह यूँही चुप साध लेंपेड़ पौदों की मानिंद जीते रहेंज़ब्ह होते रहें!वो दुआएँ जो बारूद की बू में बस करभटकती हुई ज़ेर-ए-अर्श-ए-बरीं फिर रही हैंउन्हें भूल जाएँज़िंदगी को ख़ुदा की अता जान कर ज़ेहन माऊफ़ कर लेंयावा-गोई में या ज़ेहनी हिज़्यान में ख़ुद को मसरूफ़ कर लेंउन में मिल जाएँ जो ज़िंदगी कोगोश्त से साग से दाल से नापते हैंमह-ओ-साल से नापते हैंअपना ही ख़ून पीने लगे हैंचाक-दामानियाँ ग़म से सीने लगे हैं
तमाम लफ़्ज़ों में रौशन हर इक बाब में माँजुनूँ के शेल्फ़ में है इश्क़ की किताब में माँऐ माँ तो ख़ुशबू का नायाब इस्तिआ'रा हैऐ माँ तू ऊद में अम्बर में तू गुलाब में माँख़ुद अपनी ममता में ही नूर का समुंदर हैनहीं है और किसी रौशनी की ताब में माँवो जिस्म खो के बदल सी गई है कुछ मुझ मेंथी पहले सिर्फ़ सवाल अब है हर जवाब में माँमिरे सवालों के सारे जवाब ले आईचली गई थी मगर लौटी फिर से ख़्वाब में माँमैं जब भी ज़ब्ह हुई ज़िंदगी के ख़ंजर सेदुखी है ख़्वाबों में इक दश्त-ए-इज़्तिराब में माँगँवा के जिस्म वो फ़ुर्सत से आई मेरे पाससिसक सिसक के सुनाया थी किस अज़ाब में माँमैं माँ की ज़िंदा निगाहों को ख़ुद में जीती हूँहर इंक़लाब में हर दम हर आब-ओ-ताब में माँमिरे उरूज का वो सिलसिला इनआ'म-ओ-सज़ामिरे ज़वाल में हर ज़िंदा इंक़लाब में माँतुझे लुभाने को मैं सतरंगी बनी थी माँये जा छुपी है तू किस पर्दा-ए-ग़याब में माँबंधी हैं आँखें मिरी अब भी मौत के पुल सेहै हर सुकूत में ख़ामोश इज़्तिराब में माँउमड रहे हैं हर इक पल से मौत के ढट्ढेवो जा रही है मिरी पंजा-ए-उक़ाब में माँवो जिस्म हार गई मौत से मगर मुझ मेंवो जी के गोया है फिर मौत से जवाब में माँ
सर-ब-ज़ानू हूँ झुलसते हुए रेगिस्ताँ मेंतेरी सरकार में ले आई हूँ ये वहश ज़बीह!मुझ पे लाज़िम थी जो क़ुर्बानी वो मैं ने कर दी
ज़ैनब मैं तेरी बांदीतू ऐसी बा-हौसलाइस शान से जलती ज़मीन पर चलीकि सच को ज़रूरत न रही किसी हील हुज्जत कीतेरे लिए आसमानों से कोई मो'जिज़ा नहीं उतराउजड़ा हुआ घर बे-बिज़ाअ'ती ज़मीन-ओ-आसमान की सख़्तियाँऔर तेरी इस्तक़ामतकि इस क़दर ख़ूँ-रेज़ी के बा'द भी यज़ीदी फ़त्ह का ख़त न ले सकेकिसी एक फ़र्द-ए-वाहिद से नहींतो एक पूरे ग़लत निज़ाम के मुक़ाबिल थीये वो मक़ाम था कि तारीख़-दानों ओ मुहक़्क़िक़ीन ने हार जीत के नज़रियात को अलग अंदाज़ से देखातेरी मामता को सलाम ज़ैनब अपने जिगर गोशों का ग़म उठा कर ख़ुद को टूटने नहीं दियाऐवानों में सर जोड़े बैठे अहल-ए-सियासतकिसी नतीजे पर नहीं पहुँच पातेकि बच्चों को ज़ब्ह करने वालेइंसान हैं मुसलमान हैंज़ैनबमासूम अली असग़र को ज़ब्ह करने वालों कोतू ने ख़ुदा का ये फ़रमान बावर कराया थाअल्लाह ज़ालिमों को दोस्त नहीं रखताकर्बला एक राह-ए-हिदायतरौशनी ज़रा सी दर्ज़ किसी झुर्री से दाख़िल हो करफैले हुए अँधेरे पर ग़ालिब आ जाती हैऔर तारीकी को सवेरे में बदल देने वाले रब को मालूम हैकि इश्क़ को बाक़ी रखने के लिए लहू से आबियारी की गईलहू बहता हैतो ज़मीं ज़र-ख़ेज़ होती हैवो ताएफ़ हो कूफ़ा हो या मेरी बद-नसीब ज़मीनअंधा हुजूम हाथों में पत्थर लिएजिला को बुझा देता चाहता हैजिला जो दुआ-गो हैमाबूद उन्हें बख़्श दे ये नहीं जानते ये क्या कर रहे हैंजिला बातिल के हाथों में बैअत नहीं करतीजिला मसीहा हैमुझे मस्लूब करने वालो शक़ी-उल-क़ल्ब हुकमरानोभला फूटती किरनों को भी कोई सलीब दे सकाजिला ज़ैनब हैजो जले हुए अँधेरों के बा'दहोने वाली उजड़ी सुब्ह सेउस कठिन मसाफ़त को तय करती हैकि बहुत सी घुटन और हज़ार सऊबतों के बा'दएक वो मक़ाम आता हैजो तख़्त को निशान-ए-इबरत बना दे
तीरा-ओ-तार सी ये रात, भयानक सी फ़ज़ाडगमगाते हुए क़दमों को मिरे दोस्त बढ़ाइक ज़रा और बुलंदी पे ख़ुदा-रा आ जादेख इस वुसअत-ए-तारीक के सन्नाटे कोदेवता मौत का खोले हुए जैसे शहपरऔर इस वुसअत तारीक के सन्नाटे मेंकोई छीने लिए जाता है सितारों की दमककोई बे-नूर किए देता है शोलों की लपककोई कलियों को मसलता है तो फिर क्या कीजेज़ख़्म-ए-गुल तुझ को महकना है तो हँस हँस के महककौन सय्याद की नज़रों से भला बचता हैताइर-ए-गोशा-नशीं! ख़ूब चहक! ख़ूब चहक!जागती ज़र्द सी आँखें न कहें लग जाएँदर्द-ए-इफ़्लास! ज़रा और चमक और चमक!लाल-ओ-गौहर के ख़ज़ाने भी कहीं भरते हैंअरक़-ए-मेहनत-ए-मजबूर! टपक और टपक!है तिरे ज़ोफ़ पे कुछ मस्ती-ए-सहबा का गुमाँऐ क़दम और बहक! और बहक और बहक!वो चमकती हुई आई तिरे सर पर शमशीरमिज़ा-तिफ़्लाक-ए-मासूम झपक! जल्द झपक!सीना-ए-ख़ाक में बे-कार हुआ जाता है जज़्बरुख़-ए-बे-दाद पे ऐ ख़ून झलक! आह झलक!क़तरा क़तरा यूँही टपकाता रहेगा कोई ज़हरतू भी ऐ सब्र के साग़र यूँही थम थम के छलक!मौत का रक़्स भी किया चीज़ है ऐ शम-ए-हयात!हाँ ज़रा और भड़क और भड़क और भड़क!हर तरफ़ कारगाह-ए-दहर में उठता है धुआँहर तरफ़ मौत के आसार, तबाही के निशाँसर्द अज्साम बताते नहीं मंज़िल का पताराहें वीरान हैं, मिलते नहीं राही के निशाँज़ुल्मत-ए-ग़म है कि बढ़ती ही चली जाती हैहाँ मगर किस ने जलाए हैं ये हिकमत के दिएआँखें चीख़ें कि निकल आया वो उम्मीद का चाँदचौंका दीवाना कि दामान-ए-दरीदा को सिएदौड़ा मय-ख़्वार कि इक जाम-ए-मय-ए-तुंद पिएख़्वाहिश-ए-मर्ग मिरे सीने में होने लगी ज़ब्हडूबते दिल ने दुआ माँगी की कुछ और जिए
अकड़ कर वो बोला ये मुश्किल नहींइसे ज़ब्ह मैं ख़ुद करूँगा यहीं
इन दिनों खुल कर कोई नहीं हँसताकोई नहीं रोता खुल कर
इक रोज़ किसी गाय के जी में ये समायाइंसान ने हम को तो बुरी तरह सतायालाज़िम है कि इक जल्सा करे क़ौम हमारीऔर आ के शरीक उस में हो हर अपना परायातज्वीज़ हों इस ज़ुल्म से बचने के तरीक़ेहर रोज़ की सख़्ती से तो दम नाक में आयाकुछ और भी गाएँ जो वहाँ पास थीं मौजूदउस गाय ने उन सब को भी ये भेद बतायाबस हो गई फिर जलसे की तारीख़ मुक़र्ररउन गायों ने इस में बड़ी गायों को बुलायाजब आ के वहाँ बैठ गईं सैंकड़ों गाएँइक गाय को इस जलसे का सरदार बनायाइक गाय ने फिर उठ के कहा सुनती हो बहनोइंसान ने हम को तो बहुत नाच नचायाअब बढ़ गए हैं ज़ुल्म-ओ-सितम हद से ज़ियादाकर डाला है ज़ालिम ने हज़ारों का सफ़ायादाने का तो क्या ज़िक्र नहीं घास भी मिलतीभूके रहे फ़ाक़ों ने हमें ख़ूब घुलायाइस तरह जो कमज़ोर हुए हम तो सितम हैज़ालिम ने क़साई से हमें ज़ब्ह करायामोची के हवाले हुई फिर खाल हमारीअफ़्सोस है उस ने भी तो जूता ही बनायाबस इस से ज़ियादा भी न होगी कोई ज़िल्लतअफ़्सोस है पहले से हमें ध्यान न आयाइंसान ने कुछ क़द्र न की रंज है इस काघी हम ने खिलाया उसे और दूध पिलायाबेहतर है कि अब छोड़ दें हम उस से तअ'ल्लुक़जंगल में रहें शहर में कुछ चैन न पायाघास और हरे खेत चरें अपनी ख़ुशी सेआज़ाद हों क्यों जान को ये रोग लगायातक़रीर हुई ख़त्म तो इक नीली सी गायझुँझला के उठी और उसे ग़ुस्सा बहुत आयाकहने लगी सुन ऐ मिरी पुर-जोश बहन सुनइंसान का जो ज़ुल्म-ओ-सितम तू ने जतायाइंसाफ़ से देखो तो ये है फ़र्क़ समझ काएहसान जो उस का है वो क्यों दिल से भुलायावो रात को देता है हमें वक़्त पे चारासर्दी हो तो करता है हमारे लिए सायाबरसात में मच्छर भी उड़ाता है धोएँ सेउस ने हमें तकलीफ़ से और दुख से बचायाहर तरह से करता है हिफ़ाज़त वो हमारीक्या हो गया हम ने जो उसे दूध पिलायाजंगल में ये आराम ये राहत नहीं हरगिज़तौबा करो तौबा ये है क्या जी में समायाजंगल में तो हैं शेर भी चीते भी हज़ारोंखा जाएँ हमें फाड़ के कर डालें सफ़ायासर्दी हो तो जंगल में नहीं कोठरी कोईबारिश हो तो छप्पर है कोई छत है न सायाइंसान हमारे लिए राहत का सबब हैबस हम ने उसे सुन लिया जो तुम ने सुनायाअच्छी नहीं नाशुक्र-गुज़ारी की ये बातेंअफ़्सोस है जलसे में यहीं वक़्त गँवायाइंसान ने कुछ ज़ुल्म भी हम पर किए बे-शकलेकिन न बचा उस से कोई अपना परायाजो अपने ही हम-जिंसों के हो ख़ून का प्यासाक्या शिकवा अगर हम पे उसे रहम न आयाऐ बहनो मुनासिब है कि तुम सब्र करो अबकहते हैं ख़ुदा को भी तो ये सब्र है भायाउस गाय की तक़रीर से चुप हो गई गाएँफिर सब ने कहा ठीक है जो तुम ने बताया
गंधी-पीस-फ़ाउंडेशन केऊँची छत वाले कमरे में पड़ीसोच रही थीमैं कल ईद कैसे मनाऊँगी?कि ज़मीन फट गईभौंचाल इतना तेज़ थामैं बेड से गिर कर फ़र्श पे आईबिल्कुल वैसे हीजैसे पिछली चाँद रात को तुम नेमेरे हाथों मेंचूड़ियाँ चढ़ाते हुएमुझे फ़र्श पे गिराया थाफिर ईद के दिन भी तुम ने झूट बोला थाऔर तुम्हारे झूट बोलने परसच की ज़बान ज़ब्ह कर केमैं ने जो क़ुर्बानी दी थीक्या ईद मनाने के लिए काफ़ी नहींये सोचते हुएऊँची छत वाले कमरे मेंचाँद रात गुज़र गई
बच्चो इक दिन नबी हमारेमए सहाबा सफ़र को निकलेवक़्त पकाने का जब आयासभों ने अपना हाथ बढ़ायाज़ब्ह किसी ने कर ली बकरीकिसी ने फ़ौरन खाल निकालीइक इक काम किया हर इक नेकाम हुए यूँ पूरे सारेमगर रहा लकड़ी का लानाआप ने चाहा जंगल जानाआप को हर साथी ने रोकाकिसी का लेकिन कहा न मानाऔर जंगल को आप सिधारेलाए उठा कर नबी हमारेदेख के अख़्लाक़ उन के प्यारेख़ुश हुए साथी आप के सारे'जौहर' तुम भी याद ये रखोयकसाँ समझो हर इंसाँ को
कभी कभी जी करता हैदूर फ़लक तक उड़ता जाऊँचाँद की दूधिया भेड़ को ज़ब्ह कर आऊँअपने नाख़ुन की धार सेघने पहाड़ों को चीर आऊँइतनी ज़ोर से चीख़ूँसारी खुशबू-दार हवाएँदूर तलक लुढ़केंऔर मर जाएँ
मेरे दुखों की गूँजतुम्हारी आवाज़ से सुरीली हैतुम्हारी गोयाई अब लौटी हैजब मन के साज़ सजाए थे मैं नेकि तुम बोलो तो धुन बन जाएज़िंदगी एक गीत बन जाएतुम तग़ाफ़ुल में पड़े रहेतुम्हारी आवाज़ की आरज़ू मेंमैं ने अभी तकअपने सफ़र का आग़ाज़ नहीं कियालेकिन बे-शुमार दुखमेरी जान से गुज़रते रहेरक़्स करते रहेऔर वो दर्द भी जो मेरी हमशीरा नेज़ब्ह होते हुएमेरी आँखों में रख दिया थाजब सेदुख जी रही हूँमैं तुम्हारे मंसूबे क्याख़्वाब भी नहीं जी सकती
हमेशा से वही दोज़ख़ की भारी रातकोहना ख़ौफ़ का असरारगहरी बूनुकीली क़त्लियों वाले सुअरकुत्तों की लम्बी भूँककोहरे और अंधेरे की चढ़ाईभेड़ियों के दाँतख़तरा!सुब्ह-दम बाड़े मेंकोई आदमी आता हैमोटी छाल की रस्सी गले में डालता हैज़ब्ह-ख़ाने की तरफ़ चलता हैदुनिया अपने अंदर मस्त हैअर्ज़-ओ-समा अपनी जगह मौजूद हैंपानी उसी सुरअत से दरियाओं में बहता हैपहाड़ों की वही इस्तादगीसब कुछ वही हैहस्त की साँसेंमुसलसल चल रही हैंमुज़्महिल कमज़ोर टाँगेंएक दूजे से उलझती दसतियाँबे-मायगी का आख़िरी लम्हाज़बान-ए-बे-ज़बानीएक दम गर्दन पेतेज़ी से छुरी चलती हैक़िस्सा ख़त्म होता है
वो सितम-ईजाद है वो बानी-ए-बे-दाद हैहसरतों का ख़ून करता है बड़ा जल्लाद हैबे-मुरव्वत नावक-अफ़गन का कोई क्या दे निशाननाम उस बे-दर्द का मशहूर अब सय्याद हैदाम बे-दाना का फैलाता है ऐसे जा'ल सेताइर-ए-दिल आ के ख़ुद फँसता है वो सय्याद हैज़ब्ह कर डाला किसी को नीम-बिस्मिल कर दियाकोई तन्हा है क़फ़स में बंद ख़ुद आज़ाद हैकुंद हो कितनी छुरी रुक रुक के गर्दन पर चलेहुक्म है लेकिन न सुनने पाएँ हम फ़रियाद हैबर्ग-ए-गुल को रौंद डाला जब ख़िराम-ए-नाज़ सेबुलबुलें चिल्ला उठीं फ़रियाद है फ़रियाद हैज़ुल्म बे-अंदाज़ करता है नए अंदाज़ सेफिर मज़ा ये है असीरों को उसी की याद हैचाल उस की कोई शातिर तक समझ सकता नहींकहते हैं सब अपने फ़न का एक ही उस्ताद हैदिल में कुछ इस्याँ का खटका है न ख़ौफ़-ए-बाग़बाँऔर तुर्रा है कि हथकंडों पे अपने शाद हैहुक्मराँ फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा से इक वसीअ' गुलशन का हैरहमत-ए-बारी है नाज़िल हर तरह आबाद हैनग़्मा-संजी होती है अक्सर तो इस हसरत के साथवो मुबारक हैं कि जिन पर मेहरबाँ सय्याद हैहम-सफ़ीरों से हया माने है अर्ज़-ए-हाल सेसब कहेंगे क़ैद में कितनी ज़बाँ आज़ाद हैकोई क्यों हम-जिंस के ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद पर कुढ़ेवर्ना रूदाद-ए-क़फ़स हम को सिरे से याद हैएक दिल और मुश्किलें इतनी कि मुश्किल है बयाँया-अली आसान क्यूँकर हों दम-ए-इमदाद हैक़ैद-ए-ग़म से मुर्ग़-ए-दिल को कीजिए जल्दी रिहाबे-तरह अब 'मीम' का मुज़्तर दिल-ए-नाशाद है
तूत का पेड़ था बड़ा ही घनाख़ूब फैलाओ शानदार तनाफल था इतना लगा हुआ उस मेंझुकी पड़ती थीं बोझ से शाख़ेंतिलयरों का इक आ गया झल्लड़बैठते ही मचा दिया हुल्लड़कुछ तो फल खा के उड़ गए तिलयरकुछ जो पेटू थे नीचे आए उतरढेरों देखा जो फल पड़ा नीचेतूत को देखते ही टूट पड़ेमज़े ले ले के खा रहे थे फलइतने में शोर उठा मची हलचलजाल खींचा जूँही शिकारी नेफँस गए तिलयर उस में बेचारेचीख़ने और फड़फड़ाने लगेआसमाँ सर पे वो उठाने लगेआदमी तीन चार आ पहुँचेजिन के हाथों में तेज़ चाक़ू थेरख दिए ज़ब्ह कर के सब तिलयरघर को फिर चल दिए वो ख़ुश हो करआह लालच बुरी बला है बच्चोउस के साए से भागना बच्चोलालची जो हों रहते हैं नाकामतिलयरों ही का देख लो अंजामकर के लालच न बच सका कोईतूत के बदले जान ही खोई
पुरानी बात हैलेकिन ये अनहोनी सी लगती हैवो जब पैदा हुएउन के क़बीले नेकई रातेंमुबारक साअ'तों के जश्न में काटींख़ुदा की बरतरी के गीत गाएऔर ग़ुलामों बांदियों को क़ैद से आज़ाद कर डालाकई दिन उन के खे़मेचीख़ती ख़ुशियों का गहवारा रहेउन के बुज़ुर्गों नेग़रीबों और मोहताजों कोजिंस बे-बहा बाँटीबहुत से जानवर ज़ब्ह किएसारे क़बीले नेकई दिन तककुओं से डोल खींचेराह-गीरों की दुआएँ लींवो सब नौ-ज़ाइदों को गोद में ले कररजज़ गातेसलफ़ के कारनामों का बयाँ करतेवो जब पैदा हुएफ़र्ख़न्दा तालेअ' थेमगर इक दिननसब-ज़ादों नेअपने अस्तबल खोलेसबा-रफ़्तार घोड़ों के बदन पर चाबुकें मारींहवा के दोश पर नेज़े उछालेनेक तीनत ताइफ़ों की बस्तियाँ ताराज कर आएवो पहली रात थीउन के क़बीले की कोई औरतनसब-बरदार अपने शौहरों की गोद में आ कर नहीं सोई
रात की कोई घड़ी थीया सहर-दम का समाँदोपहर या सह-पहरया वक़्त की हद से सिवाएहसास का झोंका कोईअब इस से कोई फ़र्क़ तो पड़ता नहींबहते लहू या ज़ब्ह होती गर्दनोंमिस्मार होते ख़ूब-सूरत मस्कनों के ढेर परकब वक़्त का या सा'अतों काहो सका होगा हिसाबदम तोड़ते बच्चे की सुब्ह-ओ-शाम क्याबे-नाम धुँदली सा'अतों का नाम क्याइक दर्द सारी सा'अतों से मासिवाआदमी का इक सुकूत-ए-मर्ग अन्दर सद-सुकूतरात की कोई घड़ी थीया सहर-दम का समाँऐ ख़ुदा-ए-लम-यज़लऐ चारा-साज़-ए-बे-कसाँआदमी है और बस उस की नवा-ए-बे-कराँ
न इख़्तिलात में वो रमकि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशेंन इस क़दर सुपुर्दगीकि ज़च करें नवाज़िशेंन आशिक़ी जुनून कीकि ज़िंदगी अज़ाब होन इस क़दर कठोर-पनकि दोस्ती ख़राब हो
और ज़ब्त कहे फ़रियाद न करऐ इश्क़ हमें बर्बाद न कर
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