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नज़्म
मैं जब भी ज़ब्ह हुई ज़िंदगी के ख़ंजर से
दुखी है ख़्वाबों में इक दश्त-ए-इज़्तिराब में माँ
अज़रा परवीन
नज़्म
तेरी सरकार में ले आई हूँ ये वहश ज़बीह!
मुझ पे लाज़िम थी जो क़ुर्बानी वो मैं ने कर दी
फ़हमीदा रियाज़
नज़्म
दौड़ा मय-ख़्वार कि इक जाम-ए-मय-ए-तुंद पिए
ख़्वाहिश-ए-मर्ग मिरे सीने में होने लगी ज़ब्ह
मुईन अहसन जज़्बी
नज़्म
ज़ब्ह कर डाला किसी को नीम-बिस्मिल कर दिया
कोई तन्हा है क़फ़स में बंद ख़ुद आज़ाद है