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नज़्म
ज़ाग़ दश्ती हो रहा है हम-सर-ए-शाहीन-अो-चर्ग़
कितनी सुरअ'त से बदलता है मिज़ाज-ए-रोज़गार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मैं जब भी ज़ब्ह हुई ज़िंदगी के ख़ंजर से
दुखी है ख़्वाबों में इक दश्त-ए-इज़्तिराब में माँ
अज़रा परवीन
नज़्म
इन में कुछ लीडर सिफ़त थे और कुछ वालंटियर
झुण्ड में सुरख़ाब के हों जिस तरह ज़ाग़-ओ-ज़ग़न
रज़ा नक़वी वाही
नज़्म
दौड़ा मय-ख़्वार कि इक जाम-ए-मय-ए-तुंद पिए
ख़्वाहिश-ए-मर्ग मिरे सीने में होने लगी ज़ब्ह