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नज़्म
शब-ए-ज़फ़ाफ़-ए-अबू-लहब थी मगर ख़ुदाया वो कैसी शब थी
अबू-लहब की दुल्हन जब आई तो सर पे ईंधन गले में
नून मीम राशिद
नज़्म
ज़ेर-ए-मेहराब आ गई हो उस को बेदारी की रात
ख़ुद जनाब-ए-इज़्ज़-ओ-जल से जैसे उमीद-ए-ज़फ़ाफ़
नून मीम राशिद
नज़्म
ज़फ़र-मंदों के आगे रिज़्क़ की तहसील की ख़ातिर
कभी अपना ही नग़्मा उन का कह कर मुस्कुराना है
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ज़-फ़र्क़ ता-क़दम तमाम चेहरा जिस्म-ए-नाज़नीं
लतीफ़ जगमगाहटों का कारवाँ लिए हुए
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
सुरूर बाराबंकवी
नज़्म
ज़माने में जिसे हो साहिब-ए-फ़तह-ओ-ज़फ़र होना
ज़रूरी है उसे इल्म-ओ-हुनर से बहरा-वर होना
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
पहुँचता है हर इक मय-कश के आगे दौर-ए-जाम उस का
किसी को तिश्ना-लब रखता नहीं है लुत्फ़-ए-आम उस का