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नज़्म
जब भी महताब-ए-ज़र-अफ़्शाँ के हो चेहरे पे नक़ाब
जान हम रख के हथेली पर उलट देते हैं
नूर-ए-शमा नूर
नज़्म
सर से पा तक एक ख़ूनीं राग बन कर आऊँगा
लाला-ज़ार-ए-रंग-ओ-बू में आग बन कर आऊँगा