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नज़्म
उस की बींनिश उस की वज्दानी-निगाह-ए-हक़-शनास
कर गई जो चेहरा-ए-इफ़्लास-ए-ज़र को बे-नक़ाब
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
फ़ना में हुज़्न-दीदा ज़िंदगी ज़म होती जाती है
थकी नब्ज़ों की ख़स्ता ज़र्ब मद्धम होती जाती है
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
मक़ाम-ए-नाज़ुक पे ज़र्ब-ए-कारी से जाँ बचाने का है वसीला
कि अपनी महरूमियों से छुपने का एक हीला?
नून मीम राशिद
नज़्म
ये मक़ूला हिन्द में मुद्दत से है ज़र्ब-उल-मसल
जो कि जा पहुँचा दकन में बस वहीं का हो रहा
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
अपनी हर ज़र्ब का अब ख़ुद ही निशाना हूँ मैं
जुर्म उनवान हो जिस का वो फ़साना हूँ मैं
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
ख़ुदी की ज़र्ब से लर्ज़ां है काएनात तमाम
ख़ुदी के बहर में तूफ़ाँ नहीं तो कुछ भी नहीं