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नज़्म
ख़ुद ही अपनी जान से बे-ज़ार तू इंसाफ़ कर
तुझ से अहल-ए-बज़्म फिर किस तरह ख़ुश होंगे भला
नज़्म तबातबाई
नज़्म
आओ ऐ अहल-ए-ख़िरद अहल-ए-जुनूँ अहल-ए-ज़मीं
बज़्म-ए-हस्ती में मोहब्बत से चराग़ाँ कर दें
दर्शन सिंह
नज़्म
ऐ ज़र्फ़-ए-दीद तू ही बता बज़्म-ए-तूर से
जल्वा जो उठ गया है तो मंज़र को क्या करूँ
राम लाल वर्मा हिंदी
नज़्म
सख़्त हैरत है ये किस बज़्म में बैठा हूँ मैं
अहल-ए-महफ़िल को बड़े ग़ौर से तकता हूँ मैं
जलील क़िदवई
नज़्म
मैं ने इक बज़्म-ए-सुख़न में कल ग़ज़ल अपनी पढ़ी
जिस को सुन कर अहल-ए-महफ़िल झूम उठ्ठे वज्द से
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
मैं शाइ'र हूँ मुझे अहल-ए-हुनर फ़नकार कहते हैं
मुझे रम्ज़-आश्ना-ए-निकहत-ए-गुलज़ार कहते हैं