aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "zarf-e-hausla-e-ahl-e-bazm"
बात साक़ी सुना वो जिस से हमेंज़िंदगी का शुऊ'र आ जाएवज्द करने लगें सब अहल-ए-बज़्मबे-पिए ही सुरूर आ जाए
ख़ाक-ए-पाक-ए-जामिआआसमाँ से बढ़ गया है आज तेरा मर्तबाहै तिरी आग़ोश में अब महव-ए-ख़्वाबइल्म-ओ-तहज़ीब-ओ-ख़िरद का आफ़्ताबआज है मदफ़ून तेरे सीना-ए-बे-नूर मेंमादर-ए-हिन्दोस्ताँ का नूर-ए-ऐनसद्र-ए-बज़्म-ए-अहल-ए-दिल ज़ाकिर-हुसैन
हम अजनबी थे मुसाफ़िर थे ख़ाना-वीराँ थेऔर इस अलाव के रक़्साँ हिनाई बातों नेबुला लिया हमें अपने हसीं इशारों सेतो इस की रौशनी-ए-अहमरीं की ताबिश मेंख़ुद अपने आप को इक दूसरे से पहचानाकि हम वो ख़ाना-बदोशान-ए-ज़ीस्त हैं जिन कोअज़ल से अपने ही जैसे मुसाफ़िरों की तलाशकिए हुए है इन्ही दश्त-ओ-दर में सर-गरदाँहमारी अपनी सदा अजनबी थी अपने लिएदिलों ने पहले-पहल ज़ेर-ए-लब कहा हम सेकि अहल-ए-ज़र्फ़-ओ-ग़रीबान-ए-शहर-ए-एहसासाततरस रहे हैं सुख़न-हा-ए-ग़ुफ़्तनी के लिएऔर इस अलाव के शो'लों ने हम से बातें कींहमारी गुंग ज़बानों को फिर ज़बानें दींऔर अपनी अपनी सुनाईं कहानियाँ हम नेकहानियाँ जो हक़ीक़त में एक जैसी थीं
आओ ऐ अहल-ए-ख़िरद अहल-ए-जुनूँ अहल-ए-ज़मींबज़्म-ए-हस्ती में मोहब्बत से चराग़ाँ कर देंरूह-ए-इरफ़ाँ का अनासिर को सुना कर पैग़ामआज इंसान को फिर महरम-ए-इंसाँ कर दें
तू हमेशा रहता है चीं-बर-जबीं अफ़्सुर्दा दिलफिर किसी की बज़्म-ए-इशरत में न जा बहर-ए-ख़ुदाख़ुद ही अपनी जान से बे-ज़ार तू इंसाफ़ करतुझ से अहल-ए-बज़्म फिर किस तरह ख़ुश होंगे भलाचाहिए इस तरह जाना महफ़िल-ए-अहबाब मेंबाग़ में जिस तरह ख़ुश ख़ुश आती है बाद-ए-सबाख़ैर-मक़्दम का इशारा झूम कर करती है शाख़और चटक कर देती हैं कलियाँ सदा-ए-मर्हबाजिस शजर के पास से गुज़रे लगा वो झूमनेपहुँचे जिस ग़ुंचे तक अफ़्सुर्दा था वो हँसने लगादिल पे जो गुज़रे वो गुज़रे क्यूँ किसी को हो ख़बरसब से बढ़ कर है ख़ुदा तू हाल दिल का जानताशादी-ओ-ग़म जब कि दोनों हैं जहाँ में बे-सबातवक़्त अपना काट दे हँस बोल कर बहर-ए-ख़ुदा
अब वो आवाज़ नहीं आएगीजिस के हर लोच में अंगड़ाई थीजिस के हर बोल में शहनाई थीदर्द था जिस में मोहब्बत थी फ़ुसूँ-कारी थीहर रग-ए-मुल्क में जो सारी थीज़िंदगी उस को कहाँ पाएगीअब वो आवाज़ नहीं आएगीकभी इक मर्द-ए-सियासत वो कभी इक शाइ'रनग़्मा-ए-ज़ीस्त सुनाता ही रहापरचम-ए-इश्क़ उड़ाता ही रहाएक शो'ला था कि हर बज़्म का सय्यारा थानूर ही नूरदर्द के शहर में आवारा थाकभी ख़ुद एक शिकारी वो कभी इक ताइरकभी इक मर्द-ए-सियासत वो कभी इक शाइ'रभरी बरसात से खेला बरसोंमरमरीं जिस्म कभी चाँदी रातहुस्न की बात थी उस की हर बातक़िस्सा-ए-भागमती सोज़ से मा'मूर कियासोज़ ही सोज़साज़-ओ-आहंग से मसहूर कियादर्द को जान पे झेला बरसोंभरी बरसात से खेला बरसोंख़िदमत-ए-अहल-ए-वतन कर के बना था मख़दूमउस की हर लय पे सितारे रक़्साँहैदराबाद के प्यारे रक़्साँमर्द-ए-आहन था अक़ीदे का जो पाबंद रहाजंग ही जंगजंग-जू हो के भी ख़ुरसंद रहाहाए अफ़्सोस कि है अब वो मुजाहिद मरहूमख़िदमत-ए-अहल-ए-वतन कर के बना था मख़दूम
दरिया-ए-तबी'अत को रवाँ हम ने किया हैदुर्र-ए-हा-ए-म'आनी को 'अयाँ हम ने किया हैयूँ हाल-ए-दिल-ए-ज़ार बयाँ हम ने किया हैख़ुद उन को भी अब अश्क-फ़िशाँ हम ने किया हैइन में भी नज़र कुछ की हक़ाएक़ से है महरूमये तज्ज़िया-ए-दीदा-वराँ हम ने किया हैकम हैं बहुत इंसानियत-ओ-ख़ुल्क़ की क़द्रेंये तज्रबा-ए-अहल-ए-जहाँ हम ने किया हैहै बात हमारी ही कि रिंदों को बहर-तौरज़ेर-ए-असर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ हम ने किया हैक्या ख़ूब उभर आए नुक़ूश-ए-गुल-ओ-लालाआँखों को जो ख़ूँ-नाबा-फ़शाँ हम ने किया हैइक मोड़ दिया है रुख़-ए-तारीख़ को जिस नेकिरदार वो 'आलम पे 'अयाँ हम ने किया हैमाहौल के ज़ुल्मत-कदा-ए-तीरा-शबी कोइक जल्वा-गह-ए-काहकशाँ हम ने किया हैगोया हैं दिल-ओ-दीदा ज़बाँ साकित-ओ-ख़ामोशइस तर्ज़ से भी शोर-ए-फ़ुग़ाँ हम ने किया हैपैहम रहे हम हुस्न-ए-यक़ीं के मुतजस्सिसकब कोई ग़लत वहम-ओ-गुमाँ हम ने किया है'इबरत-कदा-ए-दहर की इक खींच दी तस्वीरजब ज़िक्र-ए-जहान-ए-गुज़राँ हम ने किया हैशाइस्तगी-ए-फ़िक्र को भी नाज़ है जिस परपैदा वही उस्लूब-ए-बयाँ हम ने किया हैलब्बैक कहा है रसन-ओ-दार को जिस नेवो हौसला-ए-क़ल्ब-ए-तपाँ हम ने किया हैख़ल्लाक़-ए-दो-'आलम का किया ज़िक्र-ओ-तसव्वुरक्या ख़ूब 'इलाज-ए-ग़म-ए-जाँ हम ने किया हैहम ने ही बनाया उन्हें मरदान-ए-ख़ुश-अन्फ़ासतब्दील रूख़-ए-बादा-कशाँ हम ने किया हैहर ख़ल्वत-ओ-जल्वत में जो कहते रहे दाइमवो बरसर-ए-मिम्बर भी बयाँ हम ने किया हैहर हाल में राज़ी रहे हम उस की रज़ा मेंकब तब्सिरा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ हम ने किया हैकोहसार-ओ-समा जिस के उठाने से थे मा'ज़ूरबर्दाश्त वो इक बार-ए-गराँ हम ने किया हैहक़-गोई अगर जुर्म है ये जुर्म निको-तरहम डट के ये कहते हैं कि हाँ हम ने किया हैइंसान हैं इंसान हम इक अशरफ़-ए-मख़्लूक़तस्ख़ीर जो ये कौन-ओ-मकाँ हम ने किया हैजिस दर्जा पए-'आलम-ए-बाला है ज़रूरी'इन'आम' वो सामान कहाँ हम ने किया है
जले दिल का अरमान हूँ अहल-ए-महफ़िलमगर बज़्म की जान हूँ अहल-ए-महफ़िलउसी पर मैं क़ुर्बान हूँ अहल-ए-महफ़िलकोई दम का मेहमान हूँ अहल-ए-महफ़िलचराग़-ए-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ
झुकेगा ख़ाक पे ये क़सर-ए-आसमाँ इक दिनहमारे ज़ेर-ए-क़दम होगी कहकशाँ इक दिनबढ़ेगा जानिब-ए-मंज़िल ये कारवाँ इक दिनफ़ज़ा-ए-अर्ज़-ओ-समा होगी हम-इनाँ इक दिनहयात-ए-ख़िज़्र मिलेगी हर एक ज़र्रे कोहमारा नक़्श-ए-क़दम होगा जावेदाँ इक दिनअभी जो ख़िर्मन-ए-अहल-ए-वफ़ा पे गिरती हैंचराग़-ए-राह बनेंगी वो बिजलियाँ इक दिनब-ईं यक़ीन ओ ब-ईं एतिक़ाद-ए-हुस्न-ए-यकींअभी तो आएगा वो अहद-ए-ख़ूँ-चकाँ इक दिनवो अहद जिस में अज़ाएम के सोज़-ओ-साज़ के साथउठेगा सेना-ए-मज़दूर से धुआँ इक दिनहमारे ज़ौक़-ए-तजस्सुस की तिश्ना-कामी काज़माना लेगा सर-ए-दार इम्तिहाँ इक दिनमिलेंगे भेस में रहज़न के रहबरान-ए-वतनफ़रेब देंगे हमारे ही पासबाँ इक दिनये ज़र-परस्त कि हैं इंक़िलाब के दुश्मनमिटा के हम को बहुत होंगे शादमाँ इक दिनचमन पे फ़िरक़ा-परस्ती की आग बरसा करये फूँक देंगे हर इक शाख़-ए-आशियाँ इक दिनउन्हीं का तीर है वो 'गौडसे' हो या 'अकबर'हर एक बज़्म पे लचकेगी ये कमाँ इक दिनबनाएँगे यही जम्हूरियत के पर्दे मेंहमारे मुल्क पे ग़ैरों को हुक्मराँ इक दिनमनाएँगे ये ग़रीबों के ख़ून से होलीउजाड़ देंगे किसानों की बस्तियाँ इक दिनये जानशीन हैं रावन के इन की साज़िश सेउठेंगी राम की अज़्मत पे उँगलियाँ इक दिनजिलौ में इन के वो सैलाब-ए-किशत-ओ-ख़ूँ होगालरज़ उठेंगी हिमाला की चोटियाँ इक दिनबुतान-ए-दैर नदामत से सर-निगूँ होंगेउठेगी सेना-ए-नाक़ूस से फ़ुग़ाँ इक दिन
सख़्त हैरत है ये किस बज़्म में बैठा हूँ मैंअहल-ए-महफ़िल को बड़े ग़ौर से तकता हूँ मैं
कुछ अहल-ए-चमन फ़स्ल-ए-चमन बेच रहे हैंज़र के लिए नामूस-ए-वतन बेच रहे हैंदुश्मन हैं उजाले के ये ज़ुल्मत के परस्तारफिर सुब्ह-ए-बहाराँ की किरन बेच रहे हैंजीना जिन्हें मेहनत के सहारे नहीं आतातन बेच रहे हैं कभी मन बेच रहे हैंअब मस्लहत-अंदेश हुए अहल-ए-जुनूँ भीशोरीदगी-ए-दार-ओ-रसन बेच रहे हैंहक़-गोई में जो शोहरा-ए-आफ़ाक़ थे क्या क्यालब बेच रहे हैं वो दहन बेच रहे हैंइक अह्द से जो आबरू-ए-बज़्म-ए-सुख़न थेवो आबरू-ए-शेर-ओ-सुख़न बेच रहे हैंयूँ रेहन हैं मयख़ाने में इक जुरआ-ए-मय मेंपाकीज़गी-ए-गंग-ओ-जमन बेच रहे हैंबदनाम हो मय-ख़ाना भी साक़ी भी हो रुस्वावो बादा-ए-मय-ख़ाना-शिकन बेच रहे हैं
मैं मुनाफ़िक़ हूँ हर इक का दोस्त बन जाता हूँ मैंदोस्त बन कर दोस्तों में फूट डलवाता हूँ मैंइंतिहा की चिड़ है मुझ को दो दिलों के क़ुर्ब सेदेखता हूँ जब ये फ़ौरन जाल फैलाता हूँ मैंमैं बुराई राम की करता हूँ जा कर शाम सेशाम ने जो कुछ कहा वो राम तक लाता हूँ मैंपीठ पीछे सब को देता हूँ मुग़ल्लज़ गालियाँसामने लेकिन अदब से सर के बल जाता हूँ मैंहल्क़ा-ए-अहल-ए-सुख़न में जो मिरी तौक़ीर हैछिन न जाए हर नए शाइ'र से घबराता हूँ मैंमुझ को अपनी शायरी पर किस तरह हो ए'तिमादख़ुद तो कम कहता हूँ औरों से कहलवाता हूँ मैंदाद देने के लिए रखता हूँ कुछ अहबाब साथशे'र उन के वास्ते भी माँग कर लाता हूँ मैंबज़्म में पढ़ता हूँ मैं नथुने फुला कर चीख़ करऔर इस से पेशतर तक़रीर फ़रमाता हूँ मैंये समझता हूँ कि कोई शे'र ख़ुद कहता नहींये ख़बर हर एक के बारे में फैलाता हूँ मैंऔर कोई शे'र कह लेता है अच्छा भी अगरकल का लौंडा कह के ख़ातिर में नहीं लाता हूँ मैंख़ुद तो ना-मौज़ूँ भी कह लेता हूँ मौज़ूँ भी मगरदूसरे के शे'र पर तन्क़ीद फ़रमाता हूँ मैंशायरी से वास्ता मुझ को न उर्दू से ग़रज़सिर्फ़ शोहरत के लिए उन से उलझ जाता हूँ मैंकुछ बुज़ुर्गों से मुझे भी क़ुर्ब हासिल था कभीनाम हो उन से मिरा यूँ उन के गुन गाता हूँ मैंज़िक्र करता हूँ पुरानी सोहबतों का बार बारऔर दौर-ए-हाल को माज़ी से ठुकराता हूँ मैंबावजूद इस के अगर होती नहीं शोहरत नसीबगालियाँ देता हूँ सब को बौखला जाता हूँ मैंजिस से मैं वाक़िफ़ हूँ वो शोहरत में आगे बढ़ गयादेख कर उस को बहुत कुढ़ता हूँ बल खाता हूँ मैंजानता ही कौन था मशहूर मैं ने कर दियाबस यही कह कह के अपने दिल को समझता हूँ मैंइल्म-ओ-फ़न की चंद बातें जो मुझे मालूम हैंदाद पाने के लिए हर बार दोहराता हूँ मैंदाद देनी हो तो यूँ देता हूँ इक इक लफ़्ज़ परलफ़्ज़ पूरा भी नहीं होता फड़क जाता हूँ मैंकुछ न थे अशआ'र मुँह देखे की दी थी मैं ने दादवक़्त-ए-ग़ीबत दाद की तरदीद फ़रमाता हूँ मैंजब किसी बज़्म-ए-सुख़न में शे'र पढ़ता है कोईइक तरफ़ बैठा हुआ तसहीह फ़रमाता हूँ मैंसाथ वालों पर यूँ करता हूँ फ़ज़ीलत आश्कारहो न हो हर शे'र में कुछ ऐब गिनवाता हूँ मैंया कभी फिर दाद देता हूँ ब-आवाज़-ए-दुहलसाथ वालों की तरफ़ फिर आँख मिचकाता हूँ मैंसामने जब तक रहूँ मैं हूँ ग़ुलामों का ग़ुलामआसमाँ से वर्ना तारे तोड़ कर लाता हूँ मैंजो नहीं लाते हैं ख़ातिर में ख़ुशामद को मिरीवो झिड़क देते हैं मुझ को उन से घबराता हूँ मैंया समझ जाते हैं जो इन मेरे हथकंडों का राज़सामने आते हुए उन के भी कतराता हूँ मैंकमतरी का है 'शिफ़ा' एहसास इन सब का सबबदुश्मनी औरों के दिल में तो नहीं पाता हूँ मैं
ग़ज़ालाकई बार पूछा है मैं नेधुंधलकों में शब केमज़े शहर के चार-मीनार सेजो अहल-ए-दकन की मोहब्बत का मॉडल है अब तककई बार पूछातुझी को सर-ए-बज़्म क्यों मैं ने देखाजो देखा तो क्यों देर तक तुझ को देखा कियामुझे यूँ लगामेरे बचपन की खोई हुई आरज़ू का निशाँ मिल गयातिरा रूप आज़र का हुस्न-ए-तफ़क्कुरकोई वाहिमा तो नहींये आँखें जो ख़य्याम का मै-कदा हैंकोई हादिसा तो नहींकोई ख़्वाब-ए-रंगीं जो ता'बीर की वादियों तक न पहुँचाकोई मेरे पिछले जनम की अधूरी तमन्नाग़ज़ालाअगर शिद्दत-ए-आरज़ू में सदाक़त है अपनीतो अगले जनम में किसी मोड़ पर फिर मिलेंगेये आवा-गवन के हसीं सिलसिले तो अबद तक रहेंगेतमन्नाएँ शे'रों में ढलती रहेंगी
इस तरह आज फिर आबाद है वीराना-ए-दिलकि है लबरेज़ मय-ए-शौक़ से पैमाना-ए-दिलदिल-ए-बेताब में पिन्हाँ है हर अरमान-ए-नज़रचश्म-ए-मुश्ताक़ में है सुर्ख़ी-ए-अफ़्साना-ए-दिलआज शम्ओं से ये कह दो कि ख़बर-दार रहेंआज बेदार है ख़ाकिस्तर-ए-परवाना-ए-दिलइस को है एक फ़क़त देखने वाला दरकारतूर से कम तो नहीं जल्वा-ए-जानाना-ए-दिलजाग भी ख़्वाब से ऐ मशरिक़ ओ मग़रिब के हकीमकि तिरे वास्ते लाया हूँ मैं नज़राना-ए-दिलये ज़रा देख कि आए हैं कहाँ से दोनोंदिल तिरी ख़ाक का दीवाना मैं दीवाना-ए-दिलशौक़ की राह में इक सख़्त मक़ाम आया हैमिरा टूटा हुआ दिल ही मिरे काम आया हैसाक़ी-ए-जाँ तिरे मय-ख़ाने का इक रिंद-ए-हक़ीरमिस्ल-ए-बू तोड़ के हर क़ैद-ए-मक़ाम आया हैअल्लाह अल्लाह तिरी बज़्म का ये आलम-ए-कैफ़मेरे हाथों में छलकता हुआ जाम आया हैतिरे नाम आज ज़माने के महकते हुए फूल'ग़ालिब' ओ 'मीर' के गुलशन का सलाम आया हैवो मिरी हसरत-ए-देरीना का शहबाज़-ए-जलीलकितनी मुद्दत में बिल-आख़िर तह-ए-दाम आया हैतुझ को भी दिल में बसाया है जो 'इक़बाल' के साथतो कहीं जा के ये अंदाज़-ए-कलाम आया हैक्यूँ तुझे ये अबदी नींद पसंद आई हैऐ कि हर लफ़्ज़ तिरा शान-ए-मसीहाई हैसाक़ी-ए-मय-कदा-ए-ज़ीस्त ज़रा आँख तो खोलतिरी तुर्बत पे सियह मस्त घटा छाई हैजाग भी ख़्वाब से दिल-दादा-ए-गुलज़ार-ओ-चमनकि तिरे देस की बाग़ों पे बहार आई हैजो तिरे घर में है आज उस चमनिस्ताँ को तो देखज़र्रे ज़र्रे को जुनून-ए-चमन-आराई है'हाथवे' का है मकाँ वो कि ''मक़ाम-ए-नौ'' हैजो भी ख़ित्ता है वो इक पैकर-ए-ज़ेबाई हैकुछ ख़बर भी है कि ऐवाँ की हसीं मौजों मेंजो तिरे दौर में थी अब भी वो रानाई हैवो तिरा नग़्मा कि सीनों में तपाँ आज भी हैअहल-ए-एहसास का सरमाया-ए-जाँ आज भी हैरिंद हैं मशरिक़ ओ मग़रिब में उसी के मुश्ताक़वो तिरा बादा-ए-कोहना कि जवाँ आज भी हैआज भी काबा-ए-अरबाब-ए-नज़र है तिरी फ़िक्रविर्सा-ए-अहल-ए-जुनूँ तेरा बयाँ आज भी हैआज से चार सदी क़ब्ल जो चमका था कभीतिरे नग़्मात में वो सोज़-ए-निहाँ आज भी हैजिस में है बादा जुनूँ का भी मय-ए-होश के साथतिरे हाथों में वही रत्ल-ए-गिराँ आज भी हैतू ने तमसील के जादे पे दिखाया जो कभीवही मील और वही संग-ए-निशाँ आज भी हैज़ुल्मत-ए-दहर की रातों में सहर-बार है तूज़ीस्त इक क़ाफ़िला है क़ाफ़िला-सालार है तूतू हर इक दौर में है दीदा-ए-बीना की तरहहर ज़माने में दिल-ए-ज़िंदा-ओ-बेदार है तूजिस की बातों में धड़कता है दिल-ए-अस्र-ए-रवाँआज तमसील-ए-ज़माना का वो किरदार है तूक्यूँ न हो लौह ओ क़लम को तिरे उस्लूब पे नाज़हसन-ए-गुफ़्तार है गंजीना-ए-अफ़्कार है तूबज़्म-ए-जानाँ हो तो अंदाज़ तिरा फूल की शाख़ज़ुल्म के सामने शमशीर-ए-जिगर-दार है तोतू किसी मुल्क किसी दौर का फ़नकार नहींबल्कि हर मुल्क का हर दौर का फ़नकार है तू
हर-नफ़स पर हम मिज़ाज-ए-बाग़बाँ देखा किएयास की नज़रों से अपना आशियाँ देखा किएदेखने वाले बहार-ए-गुलिस्ताँ देखा किएहम बहारों के पस-ए-पर्दा ख़िज़ाँ देखा किएकर ही क्या सकते थे जौर-ए-आसमाँ देखा किएटूटती बिजली उजड़ता आशियाँ देखा किएहौसला-मंदों ने पा ली मंज़िल-ए-मक़्सूद भीऔर हम उड़ता ग़ुबार-ए-कारवाँ देखा किएहम ने दिल की बात कह कर फ़र्ज़ पूरा कर दियाअहल-ए-फ़न अहल-ए-ज़बाँ तर्ज़-ए-बयाँ देखा किएवक़्त की साज़िश हमें करती रही अपना शिकारऔर हम हसरत से सू-ए-आसमाँ देखा किएदिल का समझाना न था बस में किसी के ऐ 'नदीम'मेहरबाँ देखा किए ना-मेहरबाँ देखा किएइंतिहा ये है कि हम ने जान भी दे दी मगरशक की नज़रों से हमीं को बाग़बाँ देखा किएदोस्तों ने कर दिया बर्बाद हम को ऐ 'रज़ी'और हम दिल में हिसाब-ए-दोस्ताँ देखा किए
तन्हा हसीन हयात के साग़र को क्या करूँसाथी नहीं तो बादा-ए-कौसर को क्या करूँहर हुस्न पर गुमाँ है तुझे नक़्श-ए-यार काऐ इश्क़ तेरे वहम-ए-सरासर को क्या करूँरौशन थे जिस के नूर से बाम और आस्ताँवो जल्वा-गर नहीं है तो उस घर को क्या करूँजिस में वो दिलकशी है न वो शानदर-ए-दिलबरीऐसे हसीन से भी हसीं-तर को क्या करूँजिस की झलक पे लाख सितारों को रश्क थावो लौ नहीं तो मेहर-ए-मुनव्वर को क्या करूँऐ ज़र्फ़-ए-दीद तू ही बता बज़्म-ए-तूर सेजल्वा जो उठ गया है तो मंज़र को क्या करूँउस की तरफ़ से तो न थी कोताही-ए-करम'हिन्दी' मैं ख़ुद ही अपने मुक़द्दर को क्या करूँ
मैं ने इक बज़्म-ए-सुख़न में कल ग़ज़ल अपनी पढ़ीजिस को सुन कर अहल-ए-महफ़िल झूम उठ्ठे वज्द सेजोश आया एक साहब को तो उठ कर जोश मेंइक लिफ़ाफ़ा हाथ में चुपके से रख कर चल दिएमैं ये समझा इस में शायद एक सौ का नोट हैकर दिया फ़िल-फ़ौर फिर उस को हवाले जेब केजब लिफ़ाफ़ा खोल कर देखा तो ये 'उक़्दा खुलादर्ज थी उस में सना-ख़्वानी मिरी इस तरह सेसच तो ये है बेहतरीन अश’आर फ़रमाते हैं आपबज़्म को नग़्मा सुना कर वज्द में लाते हैं आप
आज़ादी-ए-वतन के मुजाहिद सुभाष बोसजनता को तुझ पे फ़ख़्र है भारत को नाज़ हैतू रख के जाँ हथेली पे बहर-ए-वतन गयाजुरअत पे तेरी मुल्क की अज़्मत को नाज़ हैअहल-ए-वतन भुला न सकेंगे कभी तुझेअज़्म-ओ-अमल पे तेरे शुजाअ'त को नाज़ हैउम्र-ए-तवील दे तुझे हक़ से है ये दुआअल्लाह और हौसला तेरा करे बुलंदतुझ आशिक़-ए-वतन पे सियासत को नाज़ हैआज़ाद हिन्द फ़ौज के आली कमांडरबाबू सुभाष बोस पे भारत को नाज़ हैआज़ादी-ए-वतन के मुजाहिद ख़ुदा करेअल्लाह तुझ को ग़ैब से ताक़त अता करे
फ़िक्र-ए-मआल है किसे फ़र्दा की फ़िक्र हैदो गज़ ज़मीं बहुत है मिरे जिस्म के लिएवक़्त-ए-सफ़र न पूछिए क्यूँकर कि हम चले'अहद-ए-वफ़ा को तोड़ के क़ैद-ए-जफ़ा हुएमंज़िल तुम्हारी आख़िरश ऐसी न थी कभीकहते न थे कि आसमाँ रोएगा एक दिनअहल-ए-सितम कफ़न को भी तरसेंगे एक दिनदार-ओ-रसन की बज़्म सजेगी न फिर कभीमक़्तल में होगी चार-सू हक़ और सच की धूमइक दिन हवा के ज़ोर को होना है ख़त्म-शुदबाद-ए-सबा मचल के सुनाएगी ये ख़बररुख़्सत ख़िज़ाँ का बाग़-ए-जहाँ से नसीब हैअब जश्न-ए-नौ-बहार की आमद क़रीब है
वो चमन में जिस ने कली कली को मिज़ाज-ए-बाद-ए-सबा दियावो हर एक ग़ुंचे के लब को जिस ने है इक शु'ऊर-ए-नवा दियावो हर एक हाल में बस्ता-लब न किसी से शिकवा न कुछ तलबग़म-ए-'आशिक़ी तिरी ख़ैर हो तुझे यादगार बना दियावो शरीक-ए-बज़्म-ए-समन-बरां वो सहीम-ए-कुल्फ़त-ए-बे-कसाँदिल-ए-रेज़ा-रेज़ा को जिस ने अपने रविश रविश पे लुटा दियारहा कज जबीं पे सर-ए-कफ़न वही हौसला वही बाँकपनपस-ए-मर्ग मैला नहीं कफ़न ये अजल को साफ़ बता दियाजिसे क़ैद-ओ-बंद के मरहले न रह-ए-वफ़ा से हटा सकेब-हमा शक़ावत-ए-दुश्मनाँ भी पयाम-ए-सिद्क़-ओ-सफ़ा दियावो जो चारा-साज़-ए-जहाँ रहा जो शरीक-ए-दर्द-ए-निहाँ रहाजो वतन की रूह-ए-रवाँ रहा उसे हम ने कितना भुला दियावो शहीद-ए-शेवा-ए-दिलबरी वो क़तील-ए-नावक-ए-दोस्तीवो ख़तीब-ए-मिम्बर-ए-आश्ती उसे अपनी क़ौम ने क्या दिया
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