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नज़्म
निगाह को थी मगर मीर-ए-कारवाँ की तलाश
नज़र जो उट्ठी तो देखा कि एक मर्द-ए-फ़क़ीर
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
ज़र्फ़-ए-नैसाँ चाहती है क़ुल्ज़ुम-आशामी तिरी
बर्ग-ए-गुल की तरह शबनम के लिए तरसा न कर
ज़फ़र अली ख़ाँ
नज़्म
न अब वो रिश्ता-ए-ज़ुन्नार है न ज़र्फ़-ए-वज़ू
तमाम तौक़-ओ-सलासिल पिघलने वाले हैं