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नज़्म
कुछ इस तरह से बढ़ा दिल में ज़ौक़-ए-आज़ादी
कि रफ़्ता रफ़्ता तमन्ना जवान होती गई
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
नशेब में उस ज़मीन-ए-मक़्तल को देखते हैं
जहाँ वो नख़्ल इस तरह गिरा है कि जैसे हाल-ए-सुजूद में हो
अख़्तर हुसैन जाफ़री
नज़्म
शो'ला-ज़न उन के लहू में है जलाल-ए-महमूद
आज तक जो तह-ए-मेहराब रहे वक़्फ़-ए-सुजूद
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
ज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में है
ज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दास्तान-ए-अहद-ए-पारीना है ज़ौक़-ए-रंग-ओ-बू
अब छलकता है ख़ुम-ओ-साग़र से इंसाँ का लहू
अख़्तर पयामी
नज़्म
अज़्मत-ए-आदम से कर के मुंज़बित अपना सुख़न
ग़म-ज़दों को जुरअत-ए-ज़ौक़-ए-सफ़र देता है वो
हबीब जौनपुरी
नज़्म
मुतमइन है तू परेशाँ मिस्ल-ए-बू रहता हूँ मैं
ज़ख़्मी-ए-शमशीर-ए-ज़ौक़-ए-जुस्तुजू रहता हूँ मैं