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नज़्म
सुना है हो भी चुका है फ़िराक़-ए-ज़ुल्मत-ओ-नूर
सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
जिन की निगाहों ने की तर्बियत-ए-शर्क़-ओ-ग़र्ब
ज़ुल्मत-ए-यूरोप में थी जिन की ख़िरद-राह-बीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
यूरोप में बहुत रौशनी-ए-इल्म-ओ-हुनर है
हक़ ये है कि बे-चश्मा-ए-हैवाँ है ये ज़ुल्मात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये सब कुछ है मगर हस्ती मिरी मक़्सद है क़ुदरत का
सरापा नूर हो जिस की हक़ीक़त मैं वो ज़ुल्मत हूँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वो मेरी जुरअतों पर बे-नियाज़ी की सज़ा देना
हवस की ज़ुल्मतों पर नाज़ की बिजली गिरा देना
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
नूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहीं
तंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मगर जो बोली तो उस के लहजे में वो थकन थी
कि जैसे सदियों से दश्त-ए-ज़ुल्मत में चल रही हो
अमजद इस्लाम अमजद
नज़्म
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अभी इम्काँ के ज़ुल्मत-ख़ाने से उभरी ही थी दुनिया
मज़ाक़-ए-ज़िंदगी पोशीदा था पहना-ए-आलम से
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जिस की मेहनत से फबकता है तन-आसानी का बाग़
जिस की ज़ुल्मत की हथेली पर तमद्दुन का चराग़
जोश मलीहाबादी
नज़्म
करोगे कब तलक नावक फ़राहम हम भी देखेंगे
कहाँ तक है तुम्हारे ज़ुल्म में दम हम भी देखेंगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
सेह-ए-ज़िंदाँ में रफ़ीक़ों के सुनहरे चेहरे
सतह-ए-ज़ुल्मत से दमकते हुए उभरे कम कम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मिरी आँखों में आँखें डाल कर जब मुस्कुराती थी
मिरे ज़ुल्मत-कदे का ज़र्रा ज़र्रा जगमगाता था