कभी हम चाक तक नहीं पहुँचे
और कभी कूज़ा-गर से टूट गए
मुझे तो इतनी ख़बर है कि मुश्त-ए-ख़ाक था मैं
जो चाक-ए-मोहलत-ए-गिर्या पे रक़्स करता रहा
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
कभी हम चाक तक नहीं पहुँचे
और कभी कूज़ा-गर से टूट गए
मुझे तो इतनी ख़बर है कि मुश्त-ए-ख़ाक था मैं
जो चाक-ए-मोहलत-ए-गिर्या पे रक़्स करता रहा