साम्प्रदायिक सद्भाव

सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या

उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या

हफ़ीज़ बनारसी

हम को आपस में मोहब्बत नहीं करने देते

इक यही ऐब है इस शहर के दानाओं में

क़तील शिफ़ाई