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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर स्कॉलर

फ़ैज़ की ग़ज़ल का बुनियादी उसूल: कैफ़ियत, मज़मून-आफ़रीनी और क्लासिकी शेरियात

फ़ैज़ की शायरी का अस्ली हुस्न रिवायती अलामतों (प्रतीकों) के सियासी इस्तेमाल में नहीं, बल्कि 'कैफ़ियत' और 'मज़मून-आफ़रीनी' की उस क्लासिकी रिवायत में है जो उनके बिना-अलामत वाले अशआर में भी साफ़ नज़र आती है।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और क्लासिकी अलामात (प्रतीकों) का नया रूप: एक तनक़ीदी मुग़ालता (भ्रम)

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के मुताबिक़, फ़ैज़ की महानता सिर्फ़ क्लासिकी अल्फ़ाज़ को नए सियासी मानी पहनाने में नहीं छिपी है, बल्कि यह दावा उनकी शायरी की समझ को महदूद (सीमित) करता है।

उर्दू ग़ज़ल में सियासी शुऊर (चेतना) की शुरुआत: हसरत, फ़ैज़ या मजरूह?

तरक़्क़ी-पसंद (प्रगतिशील) शायरों, ख़ास तौर पर मजरूह सुल्तानपुरी और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को ग़ज़ल में सियासी मौज़ू (विषय) लाने का बानी (जनक) माना जाता है, लेकिन तारीख़ी हक़ीक़तें इसका सेहरा हसरत मोहानी के सिर बांधती हैं।

उर्दू ग़ज़ल: हिंदुस्तानी तहज़ीब और समाजी शुऊर का आईना

उर्दू ग़ज़ल पर फ़ारसी का गहरा असर होने के बावुजूद, यह हिंदुस्तानी तहज़ीब, मौसमों, रस्म-ओ-रिवाज और समाजी और सियासी करवटों की एक सच्ची और रंगारंग तस्वीर पेश करती है।

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