फ़ैज़ की ग़ज़ल का बुनियादी उसूल: कैफ़ियत, मज़मून-आफ़रीनी और क्लासिकी शेरियात
फ़ैज़ की शायरी का अस्ली हुस्न रिवायती अलामतों (प्रतीकों) के सियासी इस्तेमाल में नहीं, बल्कि 'कैफ़ियत' और 'मज़मून-आफ़रीनी' की उस क्लासिकी रिवायत में है जो उनके बिना-अलामत वाले अशआर में भी साफ़ नज़र आती है।