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ख़ुदी पर नज़्में

ख़ुदी इंसान के अपने

बातिन और उजूद को पहचानने का एक ज़रिया है। कई शायरों ने ख़ुदी के फ़लसफ़े को मुनज़्ज़म अंदाज़ से अपनी फ़िक्री और तख़्लीक़ी असास के तौर पर बर्ता है। अगर्चे इस तरह के मज़ामीन शायरी में आम रहे हैं लेकिन इक़बाल के यहाँ ये रवय्या हावी है। इस शायरी के पढ़ने से आप को अपनी उजूदी अज़मतों का एहसास भी दिलाएगी।