अगर मैं किसी औरत के सीने का ज़िक्र करना चाहूँगा तो उसे औरत का सीना ही कहूँगा। औरत की छातियों को आप मूंगफ़ली, मेज़ या उस्तुरा नहीं कह सकते... यूँ तो बाअज़ हज़रात के नज़दीक औरत का वुजूद ही फ़ोह्श है, मगर उसका क्या ईलाज हो सकता है?
ज़बान बनाई नहीं जाती, ख़ुद बनती है और ना इन्सानी कोशिशें किसी ज़बान को फ़ना कर सकती हैं।
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हिन्दी के हक़ में हिंदू क्यों अपना वक़्त ज़ाया करते हैं। मुसलमान, उर्दू के तहफ़्फ़ुज़ के लिए क्यों बेक़रार हैं...? ज़बान बनाई नहीं जाती, ख़ुद बनती है और ना इन्सानी कोशिशें किसी ज़बान को फ़ना कर सकती हैं।
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ज़बान में बहुत कम लफ़्ज़ फ़ोह्श होते हैं। तरीक़-ए-इस्तेमाल ही एक ऐसी चीज़ है जो पाकीज़ा से पाकीज़ा अल्फ़ाज़ को भी फ़ोह्श बना देता है।
ज़बान और अदब की ख़िदमत हो सकती है सिर्फ़ अदीबों और ज़बान-दानों की हौसला-अफ़ज़ाई से। और हौसला-अफ़ज़ाई सिर्फ उनकी मेहनत का मुआवज़ा अदा करने ही से हो सकती है।
हिन्दी हिन्दुस्तानी और उर्दू हिन्दी के क़ज़िये से हमें कोई वास्ता नहीं। हम अपनी मेहनत के दाम चाहते हैं। मज़मून-नवीसी हमारा पेशा है, फिर क्या वजह है कि हम उस के ज़रीये से ज़िंदा रहने का मुतालिबा ना करें। जो पर्चे, जो रिसाले, जो अख़बार हमारी तहरीरों के दाम अदा नहीं कर सकते बिलकुल बंद हो जाने चाहिऐं।