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अदबी तनक़ीद पर स्कॉलर

मीर तक़ी मीर: दुनिया से बेज़ार या ज़िंदगी की नब्ज़ पहचानने वाले?

मुहम्मद हुसैन आज़ाद की फैलाई हुई इस ग़लतफ़हमी को दूर करना कि मीर तक़ी मीर दुनिया से बेज़ार और अलग-थलग रहने वाले शायर थे, और उनके कलाम की रोशनी में समाज से उनके जुड़ाव का सुबूत।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का मानियाती निज़ाम (अर्थ-तंत्र): क्लासिकी शब्दावली में इंक़िलाब की रूह

यह लेख इस बात पर चर्चा करता है कि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने किस तरह क्लासिकी ग़ज़ल की पुरानी शब्दावली को नए सामाजिक और राजनीतिक मानी देकर एक अनोखा अर्थ-तंत्र बनाया।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और क्लासिकी अलामात (प्रतीकों) का नया रूप: एक तनक़ीदी मुग़ालता (भ्रम)

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के मुताबिक़, फ़ैज़ की महानता सिर्फ़ क्लासिकी अल्फ़ाज़ को नए सियासी मानी पहनाने में नहीं छिपी है, बल्कि यह दावा उनकी शायरी की समझ को महदूद (सीमित) करता है।

ग़ज़ल की बनावट और आलोचना: क्या ग़ज़ल एक 'नीम-वहशियाना' विधा है?

ग़ज़ल की बनावट, उसकी 'रेज़ा-ख़याली' (बिखरे विचारों) और जुड़ाव व निरंतरता की कमी पर कलीमउद्दीन अहमद और अज़मतउल्लाह ख़ाँ की आलोचनाओं का जायज़ा, और ग़ज़ल के बचाव में पूर्वी कला दृष्टिकोण की अहमियत।

अश्लीलता और बराज़ियात: चिरकीन की शायरी को समझने का नया नज़रिया

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने चिरकीन की शायरी पर लगे 'अश्लीलता' के इल्ज़ाम का आलोचनात्मक जायज़ा लेते हुए 'अश्लीलता' (Pornography) और 'बराज़ियात' (Scatology) के बीच साफ़ फ़र्क़ क़ायम किया है।

क्या 'साहिब-ए-ज़ौक़' पाठक का कोई वुजूद है?

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के मुताबिक़ 'साहिब-ए-ज़ौक़ पाठक' एक फ़र्ज़ी ख़याल है जिसे आलोचक अपनी नासमझी छिपाने और मुश्किल शायरी को ख़ारिज करने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

महान शायर की नक़्ल की त्रासदी: क्या बड़े फ़नकार का कोई वारिस होता है?

यह मज़मून (लेख) इस हक़ीक़त पर बहस करता है कि एक महान शायर अपने पीछे नक़्ल करने वालों का कोई स्कूल नहीं छोड़ता, बल्कि उसके फ़ौरन बाद आने वाले शायर जाने-अनजाने में उसके अंदाज़ (शैली) से अलग राह अपनाते हैं।

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